विस्तृत उत्तर
तुलसीदासजी ने गुरु वन्दना में गुरु के चरणकमलों की तुलना कई चीज़ों से की है।
पहली उपमा — गुरु को कृपा का समुद्र और नररूपी श्रीहरि कहा: 'बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥' अर्थ — मैं उन गुरु महाराजके चरणकमलकी वन्दना करता हूँ जो कृपाके समुद्र और नररूपमें श्रीहरि ही हैं और जिनके वचन महामोहरूपी घने अन्धकारके नाश करनेके लिये सूर्य-किरणोंके समूह हैं।
दूसरी उपमा — गुरु के चरण-रज को अमृत चूर्ण कहा: 'बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा। अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥' अर्थ — गुरु महाराजके चरणकमलोंकी रजकी वन्दना करता हूँ जो सुरुचि (सुन्दर स्वाद), सुगन्ध तथा अनुरागरूपी रससे पूर्ण है। वह अमर मूल (संजीवनी जड़ी) का सुन्दर चूर्ण है जो सम्पूर्ण भवरोगोंके परिवारको नाश करनेवाला है।
तीसरी उपमा — गुरु के चरण-नखों को मणियों की ज्योति कहा: 'श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिव्य दृष्टि हियँ होती॥' अर्थ — श्रीगुरु महाराजके चरण-नखोंकी ज्योति मणियोंके प्रकाशके समान है, जिसके स्मरण करते ही हृदयमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है।





