भक्ति एवं आध्यात्मभाग्य और पुरुषार्थ में क्या संबंध हैभाग्य पूर्व कर्मों का परिणाम है और पुरुषार्थ वर्तमान का प्रयास। दोनों परस्पर पूरक हैं — भाग्य परिस्थितियाँ देता है, पुरुषार्थ उन्हें बदलता है। गीता में कर्म को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।#भाग्य#पुरुषार्थ#कर्म
भक्ति एवं आध्यात्मकिस्मत क्या होती है हिंदू धर्म के अनुसारहिंदू धर्म में किस्मत को 'प्रारब्ध' कहते हैं — यह हमारे पूर्व जन्मों के संचित कर्मों में से उस अंश का फल है जो इस जन्म में भोगने के लिए निर्धारित है। यह कोई अंधी शक्ति नहीं बल्कि स्वयं हमारे ही कर्मों का प्रतिफल है।#किस्मत
रामचरितमानस — बालकाण्ड'होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा' — अर्थ?जो राम ने रचा वही होगा, तर्क से क्या? शिवजी ने सतीजी को कहा। शिक्षा — ईश्वर की योजना सर्वोपरि।#बालकाण्ड#राम रचि राखा#भाग्य
दार्शनिक आधारकहल योग में 'नवम भाव' (भाग्य/धर्म) का क्या रोल है?नवम भाव इंसान के भाग्य, धर्म, नैतिकता और पिछले जन्म के पुण्यों का भाव है। यह व्यक्ति को एक दूरदर्शी शासक बनाता है और विषम परिस्थितियों में 'ईश्वरीय ढाल' की तरह रक्षा करता है।#नवम भाव#भाग्य#धर्म