विस्तृत उत्तर
हिंदू धर्म में 'किस्मत' या 'भाग्य' को 'प्रारब्ध' कहा जाता है। यह कोई रहस्यमय या अंधी शक्ति नहीं है — यह हमारे स्वयं के पूर्व कर्मों का सुनियोजित फल है।
शास्त्रों के अनुसार, कर्म तीन रूपों में होता है। पहला है संचित कर्म — यह अनेक जन्मों में किए गए समस्त कर्मों का भंडार है जो अभी फलित नहीं हुआ। दूसरा है प्रारब्ध कर्म — इसी संचित भंडार में से जो अंश इस विशेष जन्म में भोगने के लिए निर्धारित हो गया है, उसे प्रारब्ध कहते हैं। तीसरा है क्रियमाण कर्म — जो कर्म हम अभी इस वर्तमान जीवन में कर रहे हैं।
भाग्य वास्तव में प्रारब्ध है। यही निर्धारित करता है कि हम किस परिवार में जन्म लें, कौन सा शरीर मिले, जीवन की आरंभिक परिस्थितियाँ कैसी हों। महाभारत के अनुशासनपर्व में कहा गया है — 'न बीजेन विना फलम्' अर्थात बीज बोए बिना फल नहीं होता। भाग्य उन बीजों का फल है जो हमने किसी न किसी जन्म में बोए।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जन्मकुंडली में नवम भाव को भाग्य का स्थान माना जाता है। इसके साथ ही भगवान ब्रह्मा को भाग्य का निर्माता माना गया है, जो जीव के कर्मों के अनुसार उसका भाग्य विधान करते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हिंदू धर्म भाग्य को अंतिम और अपरिवर्तनीय नहीं मानता। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें वर्तमान कर्म (क्रियमाण) से संचित कर्म बदलते हैं और आगे के प्रारब्ध बनते हैं।





