शास्त्रीय पौराणिक मंत्र
माँ लक्ष्मी मंत्र
दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट स्वर्वाहिनी विमलचारुजलप्लुताङ्गीम्। प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम्॥
साधना मंडल
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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प्रकारकनकधारा (श्लोक 19) / गजलक्ष्मी ध्यान
अर्थ एवं भावार्थ
इस मंत्र का अर्थ
आठों दिशाओं के दिग्गजों द्वारा स्वर्ण-कलशों से गंगाजल द्वारा जिनका अभिषेक किया जा रहा है, उन जगन्माता, विष्णु-पत्नी और अमृत-सागर की पुत्री को मैं प्रातः प्रणाम करता हूँ।
लाभ एक दृष्टि में
इस मंत्र से क्या होगा?
01
घर में पवित्रता, ऐश्वर्य और राजसम्मान की प्राप्ति
विस्तृत लाभ
घर में पवित्रता, ऐश्वर्य और राजसम्मान की प्राप्ति 44।
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