विस्तृत उत्तर
पुरूरवा और आर्द्रव विश्वेदेवों की एक जोड़ी हैं, जो पार्वण श्राद्ध में आहूत होते हैं। शास्त्रीय आधार के अनुसार महालय के इस द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों यानी पुरूरवा और आर्द्रव अथवा क्रतु और दक्ष की स्थापना अनिवार्य होती है।
पुरूरवा कौन थे, इसका विस्तृत वर्णन विष्णु पुराण में है। विष्णु पुराण के तृतीय अंश में चन्द्रवंशी सम्राट महाराज पुरुरवा का प्रसंग वर्णित है। महाराज पुरुरवा एक चन्द्रवंशी सम्राट थे, जो अत्यंत धर्मपरायण और विष्णु भक्त थे।
पुरूरवा का मूल कथानक अत्यंत रोचक है। पुराण बताता है कि पूर्व काल में कलाप उपवन यानी जंगल में पितृगण आपस में वार्तालाप कर रहे थे, और उनकी यह गाथा महाराज तक पहुँची। पितृगण अत्यंत उत्सुकता और वात्सल्य से कह रहे थे, क्या हमारे कुल में आगे चलकर कोई ऐसा सन्मार्गशील और धर्मपरायण व्यक्ति उत्पन्न होगा, जो गया तीर्थ में जाकर हमारे लिए आदरपूर्वक पिण्डदान करेगा?
पितृगण की चार मुख्य अपेक्षाएँ थीं। पहली अपेक्षा थी कि कोई वंशज गया तीर्थ में पिण्डदान करे। दूसरी थी कि वर्षा ऋतु के पितृ पक्ष में त्रयोदशी या प्रतिपदा तिथि को मधु शहद और घृत घी युक्त पायस यानी खीर का दान करे। तीसरी थी कि नीला वृषभ छोड़े यानी वृषोत्सर्ग करे। चौथी थी कि ब्राह्मणों को दक्षिणा सहित संतुष्ट करे।
महाराज पुरुरवा ने पितरों की इस आकांक्षा को पूर्ण किया। महाराज पुरुरवा, जो अत्यंत धर्मपरायण और विष्णु भक्त थे, ने अपने पितरों की इस आकांक्षा को पूर्ण किया, और विधिपूर्वक श्राद्ध संपन्न कर उन्हें परम तृप्ति प्रदान की।
इस श्राद्ध से पुरूरवा को अद्वितीय फल मिले। परिणामस्वरूप, पितरों के आशीर्वाद से पुरुरवा ने अकूत ऐश्वर्य, धर्म और अंततः मोक्ष प्राप्त किया। ये तीन फल - अकूत ऐश्वर्य, धर्म और मोक्ष - उनकी श्रद्धा और भक्ति का परिणाम थे।
पुरूरवा का चन्द्रवंशी सम्राट होना भी विशेष है। चन्द्रवंश सनातन धर्म के दो प्रमुख वंशों में से एक है, दूसरा सूर्यवंश है। पुरूरवा इस चन्द्रवंश के एक श्रेष्ठ सम्राट थे। चन्द्रवंश का चन्द्रमा से सीधा सम्बन्ध है, और चन्द्रमा पितरों का स्वामी है। इसलिए चन्द्रवंशी सम्राट का पितरों से विशेष सम्बन्ध स्वाभाविक है।
पुरूरवा के दो प्रमुख गुण विशेष हैं। पहला गुण है धर्मपरायण होना यानी धर्म के अनुसार आचरण करने वाला। दूसरा गुण है विष्णु भक्त होना यानी भगवान विष्णु का परम भक्त। दोनों गुण एक श्रेष्ठ सम्राट और मनुष्य के लिए आवश्यक हैं।
पुरूरवा का विश्वेदेवों में स्थान कैसे मिला, इसका कारण उनकी विशेष भक्ति है। उन्होंने अपने पितरों के लिए जो विधिपूर्वक श्राद्ध किया, उससे पितर इतने प्रसन्न हुए कि उन्हें विश्वेदेवों में स्थान दिया गया। यह सिद्ध करता है कि श्रद्धा और भक्ति से ही व्यक्ति देवत्व प्राप्त करता है।
आर्द्रव कौन हैं, इसका वर्णन शास्त्रों में अल्प मिलता है। आर्द्रव पुरूरवा के सहचर देवता हैं, जो उनके साथ विश्वेदेवों की एक जोड़ी बनाते हैं। दोनों मिलकर श्राद्ध में आहूत होते हैं और हवि को पितरों तक पहुँचाने में सहायक होते हैं।
पुरूरवा-आर्द्रव की जोड़ी का विशेष महत्व यह है कि यह श्राद्ध की सर्वश्रेष्ठ भावना का प्रतीक है। पुरूरवा ने जो भक्ति से श्राद्ध किया, वह सब वंशजों के लिए आदर्श है। उनकी कथा प्रेरणा देती है कि कोई भी वंशज, चाहे वह सम्राट हो या साधारण व्यक्ति, यदि अपने पितरों के लिए श्रद्धा से श्राद्ध करे, तो उसे अकूत ऐश्वर्य, धर्म और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पुरूरवा-आर्द्रव की पूजा-विधि भी विशेष है। श्राद्ध की वेदी पर विश्वेदेवों के लिए अलग आसन और अर्पण की व्यवस्था होती है। पुरूरवा-आर्द्रव के निमित्त भी हवि अर्पित की जाती है, और मन्त्रों से उनका आवाहन किया जाता है।
यह जोड़ी और क्रतु-दक्ष की जोड़ी, दोनों ही विश्वेदेवों के स्वरूप हैं। शास्त्रों में स्थानीय परम्परा के अनुसार किसी एक जोड़ी की स्थापना की जाती है। दोनों ही समान रूप से शास्त्र-सम्मत हैं, और दोनों ही श्राद्ध को पूर्ण बनाते हैं।
पुरूरवा की कथा का सम्पूर्ण संदेश यह है कि पितर अपने वंशजों से श्राद्ध की कितनी गहरी अपेक्षा रखते हैं। यदि वंशज इन अपेक्षाओं को पूरा करें, तो पितर परम तृप्ति प्राप्त करते हैं, और बदले में वंशजों को सर्वोच्च आशीर्वाद देते हैं। पुरूरवा इसका जीवंत उदाहरण हैं। शास्त्रीय आधार के रूप में विष्णु पुराण और श्राद्ध-तत्त्व इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः पुरूरवा और आर्द्रव विश्वेदेवों की एक जोड़ी हैं। पुरूरवा एक चन्द्रवंशी सम्राट थे, जो अत्यंत धर्मपरायण और विष्णु भक्त थे। उन्होंने अपने पितरों की आकांक्षा को पूर्ण कर विधिपूर्वक श्राद्ध संपन्न किया, और परिणामस्वरूप अकूत ऐश्वर्य, धर्म और मोक्ष प्राप्त किया। आर्द्रव उनके सहचर देवता हैं। यह जोड़ी पार्वण श्राद्ध में आहूत होती है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक