विस्तृत उत्तर
शक्तिपात = गुरु द्वारा शिष्य में शक्ति (कुण्डलिनी ऊर्जा) का प्रत्यक्ष प्रेषण। 'जैसे एक दीपक से दूसरा प्रज्वलित' — वैसे गुरु से शिष्य में शक्ति।
प्रकार: तीव्र (तत्काल कुण्डलिनी जागरण), मध्यम (क्रमिक जागरण), मंद (धीमा प्रभाव)।
अनुभव (शास्त्र और परंपरा अनुसार)
- 1शारीरिक: शरीर में कंपन/स्पंदन, ऊष्मा/शीतलता, स्वतः आसन/मुद्रा।
- 2प्राणिक: श्वास में परिवर्तन (तीव्र/धीमी), प्राणायाम स्वतः।
- 3मानसिक: गहन शांति, आनंद, भावातिरेक (रोना/हंसना)।
- 4आध्यात्मिक: प्रकाश दर्शन, मंत्र ध्वनि, देवता दर्शन (कुछ में)।
- 5कुण्डलिनी: मूलाधार से ऊर्जा ऊपर उठती अनुभव।
ध्यान रखें
- ▸हर व्यक्ति का अनुभव भिन्न — कुछ में तत्काल, कुछ में विलंबित।
- ▸सिद्ध गुरु से ही शक्तिपात लें — अयोग्य 'गुरु' से हानि संभव।
- ▸शक्तिपात ≠ जादू — साधना जारी रखना अनिवार्य।
- ▸अतिशयोक्तिपूर्ण दावों से सावधान — विवेक रखें।

