का सरल उत्तर
भगवान ने शाप प्रसन्नतापूर्वक सिर पर चढ़ाया — यह उनकी लीला-योजना का अंश था। नारदजी के पश्चाताप पर कहा — सब मेरी इच्छा से हुआ, चिन्ता मत करो। शंकर शतनाम जपो, शान्ति मिलेगी। 'कोउ नहीं सिव समान प्रिय मोरें' — शिवजी के समान मुझे कोई प्रिय नहीं।