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रामचरितमानस — बालकाण्ड⏱ 1 मिनट पठन

भगवान ने नारदजी के शाप को कैसे स्वीकार किया?

भगवान ने शाप प्रसन्नतापूर्वक सिर पर चढ़ाया — यह उनकी लीला-योजना का अंश था।

संक्षिप्त उत्तर

भगवान ने शाप प्रसन्नतापूर्वक सिर पर चढ़ाया — यह उनकी लीला-योजना का अंश था। नारदजी के पश्चाताप पर कहा — सब मेरी इच्छा से हुआ, चिन्ता मत करो। शंकर शतनाम जपो, शान्ति मिलेगी। 'कोउ नहीं सिव समान प्रिय मोरें' — शिवजी के समान मुझे कोई प्रिय नहीं।

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विस्तृत उत्तर

भगवान ने नारदजी के शाप को प्रसन्नतापूर्वक सिरपर चढ़ाकर स्वीकार किया।

बालकाण्ड में कहा — शापको सिरपर चढ़ाकर, हृदयमें हर्षित होते हुए प्रभुने नारदजीसे बहुत विनती की और कृपानिधान भगवानूने अपनी मायाकी प्रबलता खींच ली (माया हटा ली)।

भगवान प्रसन्न इसलिये हुए क्योंकि यह शाप उनकी ही लीला-योजना का अंश था — नारदजी के शाप के बहाने ही उन्हें मनुष्य रूप में अवतार लेने का कारण मिला।

बाद में जब नारदजी को पश्चाताप हुआ और उन्होंने भगवान से कहा — 'मृषा होउ मम श्राप कृपाला' (हे कृपालु! मेरा शाप मिथ्या हो जाय) — तब भगवान ने कहा कि यह सब मेरी ही इच्छा से हुआ है, चिन्ता मत करो। जाकर शंकरजी के शतनाम का जप करो, शान्ति मिलेगी। शिवजी के समान मुझे कोई प्रिय नहीं — यह विश्वास कभी मत छोड़ना।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

भगवान ने नारदजी के शाप को कैसे स्वीकार किया को संदर्भ सहित समझें

भगवान ने नारदजी के शाप को कैसे स्वीकार किया का सबसे सीधा सार यह है: भगवान ने शाप प्रसन्नतापूर्वक सिर पर चढ़ाया — यह उनकी लीला-योजना का अंश था। नारदजी के पश्चाताप पर कहा — सब मेरी इच्छा से हुआ, चिन्ता मत करो।...

रामचरितमानस — बालकाण्ड जैसे विषयों में यह देखना जरूरी होता है कि बात किस परिस्थिति में लागू होती है, किन नियमों के साथ मान्य होती है और व्यवहार में इसका सही अर्थ क्या निकलता है.

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रामचरितमानस — बालकाण्ड प्रश्नोत्तर
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