विस्तृत उत्तर
भगवान ने नारदजी के शाप को प्रसन्नतापूर्वक सिरपर चढ़ाकर स्वीकार किया।
बालकाण्ड में कहा — शापको सिरपर चढ़ाकर, हृदयमें हर्षित होते हुए प्रभुने नारदजीसे बहुत विनती की और कृपानिधान भगवानूने अपनी मायाकी प्रबलता खींच ली (माया हटा ली)।
भगवान प्रसन्न इसलिये हुए क्योंकि यह शाप उनकी ही लीला-योजना का अंश था — नारदजी के शाप के बहाने ही उन्हें मनुष्य रूप में अवतार लेने का कारण मिला।
बाद में जब नारदजी को पश्चाताप हुआ और उन्होंने भगवान से कहा — 'मृषा होउ मम श्राप कृपाला' (हे कृपालु! मेरा शाप मिथ्या हो जाय) — तब भगवान ने कहा कि यह सब मेरी ही इच्छा से हुआ है, चिन्ता मत करो। जाकर शंकरजी के शतनाम का जप करो, शान्ति मिलेगी। शिवजी के समान मुझे कोई प्रिय नहीं — यह विश्वास कभी मत छोड़ना।





