का सरल उत्तर
दूज श्राद्ध दक्षिण-पश्चिम यानी नैऋत्य कोण की दिशा में मुख करके करना चाहिए। साथ ही कर्ता का जनेऊ अपसव्य अवस्था में दाएँ कंधे पर होना चाहिए। आसन रेशम, कम्बल, काठ यानी लकड़ी या कुशा का होना चाहिए। लोहे का आसन सर्वथा वर्जित है। दक्षिण दिशा यमलोक और पितृलोक की दिशा है, इसलिए नैऋत्य पितृ-कर्म के लिए शास्त्र-सम्मत है।
मूल प्रश्न का सम्पूर्ण शास्त्रीय उत्तर एक स्थान पर।
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