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श्राद्ध विधि⏱ 5 मिनट पठन

दूज श्राद्ध किस दिशा में करें?

दूज श्राद्ध दक्षिण-पश्चिम यानी नैऋत्य कोण की दिशा में मुख करके करना चाहिए।

संक्षिप्त उत्तर

दूज श्राद्ध दक्षिण-पश्चिम यानी नैऋत्य कोण की दिशा में मुख करके करना चाहिए। साथ ही कर्ता का जनेऊ अपसव्य अवस्था में दाएँ कंधे पर होना चाहिए। आसन रेशम, कम्बल, काठ यानी लकड़ी या कुशा का होना चाहिए। लोहे का आसन सर्वथा वर्जित है। दक्षिण दिशा यमलोक और पितृलोक की दिशा है, इसलिए नैऋत्य पितृ-कर्म के लिए शास्त्र-सम्मत है।

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विस्तृत उत्तर

दूज श्राद्ध दक्षिण-पश्चिम यानी नैऋत्य कोण की दिशा में मुख करके किया जाना चाहिए। शास्त्रीय आधार के अनुसार कर्ता को अपना यज्ञोपवीत यानी जनेऊ बाएँ कंधे से हटाकर दाएँ कंधे पर करना होता है, जिसे अपसव्य कहा जाता है। कर्ता का मुख दक्षिण-पश्चिम यानी नैऋत्य दिशा की ओर होना चाहिए।

नैऋत्य कोण का अर्थ देखें तो यह दक्षिण और पश्चिम के बीच की दिशा है। इसे अंग्रेजी में South-West भी कहते हैं। आठ दिशाओं में नैऋत्य एक विशेष कोण है। संस्कृत में नैऋति शब्द से नैऋत्य बना है, जो राक्षसों या उग्र शक्तियों का स्थान माना गया है। पितृ-कर्म के लिए यही दिशा शास्त्र-सम्मत है।

नैऋत्य दिशा का धार्मिक महत्व विशेष है। शास्त्रों में दक्षिण दिशा को यमलोक और पितृलोक की दिशा माना गया है। पितर इसी दिशा से वायु रूप में आते हैं। पश्चिम दिशा का सम्बन्ध सूर्यास्त और सम्पूर्ण होने की क्रिया से है। दोनों के मिलन यानी नैऋत्य पर पितृ-कर्म विशेष रूप से प्रभावी होता है।

श्राद्ध के समय कर्ता की स्थिति इस प्रकार होती है। पहली स्थिति है अपसव्य की। कर्ता को अपना यज्ञोपवीत बाएँ कंधे से हटाकर दाएँ कंधे पर करना होता है। साधारण देव-कार्यों में जनेऊ बाएँ कंधे पर रहता है, परंतु पितृ-कर्म में इसे दाएँ कंधे पर ले जाते हैं। यही अपसव्य अवस्था है।

दूसरी स्थिति है मुख की। कर्ता का मुख दक्षिण-पश्चिम यानी नैऋत्य दिशा की ओर होना चाहिए। मुख का अर्थ है चेहरे की दिशा। कर्ता को इस दिशा में मुख करके बैठना चाहिए, ताकि वह पितरों के लोक की ओर अपना अभिवादन और अर्पण कर सके।

तीसरी स्थिति है आसन की। श्राद्ध में लोहे का आसन वर्जित है। इसके लिए रेशम, कम्बल, काठ यानी लकड़ी या कुशा का आसन ही सर्वोत्तम है। कर्ता को इन्हीं में से किसी एक आसन पर बैठकर श्राद्ध करना चाहिए।

इन तीनों स्थितियों का सम्मिलित प्रभाव यह होता है कि कर्ता अपने आप को पितरों के साथ जोड़ लेता है। अपसव्य से उसका शरीर पितृ-कर्म के लिए उपयुक्त बनता है। नैऋत्य मुख से उसकी चेतना पितरों की ओर मुड़ जाती है। और शुद्ध आसन से उसका स्थान पवित्र बना रहता है।

पिण्डदान की प्रक्रिया भी इसी दिशा में होती है। सत्तू, काले तिल, घृत और मधु को मिलाकर पिण्ड तैयार किए जाते हैं और कुशाओं पर पितरों के गोत्र और नाम का उच्चारण करते हुए अर्पित किए जाते हैं। पिण्डों की स्थापना भी दक्षिण दिशा की ओर ही की जाती है।

भगवान वराह की कथा भी इसी दिशा से जुड़ी है। जब उन्होंने हिरण्याक्ष का वध कर पृथ्वी को रसातल से बाहर निकाला, तब उनकी दाढ़ से पृथ्वी का कुछ मृदा-अंश दक्षिण दिशा की ओर छिटक कर गिरा। उसी मृदा-अंश से तीन गोल पिण्डों का निर्माण किया गया, जो पितरों का प्रतीक हैं। इसलिए पिण्डदान दक्षिण दिशा से जुड़ा है।

नैऋत्य दिशा का चयन वैज्ञानिक भी है। दक्षिण दिशा में चुम्बकीय तरंगें ऊपर से नीचे की ओर बहती हैं, जो पितरों के लोक यानी ऊर्ध्व लोक से नीचे आने का संकेत देती हैं। पश्चिम दिशा सूर्य के अस्त होने की दिशा है, जो जीवन के समापन का प्रतीक है। दोनों के मिलन पर पितृ-कर्म स्वाभाविक रूप से प्रभावी होता है।

भोजन कराते समय भी विशेष व्यवस्था है। ब्राह्मणों को इसी दिशा में बैठाकर भोजन कराया जाता है, क्योंकि उनके शरीर में पितरों की उपस्थिति की भावना की जाती है। ब्राह्मण भोजन के समय कर्ता को पूर्णतः मौन रहना चाहिए और ब्राह्मणों से अनावश्यक वार्तालाप नहीं करना चाहिए। शास्त्रीय आधार के रूप में आश्वलायन गृह्यसूत्र, याज्ञवल्क्य स्मृति, गरुड़ पुराण और वराह पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः दूज श्राद्ध में कर्ता को दक्षिण-पश्चिम यानी नैऋत्य दिशा की ओर मुख करना चाहिए। साथ ही जनेऊ अपसव्य अवस्था में दाएँ कंधे पर होना चाहिए। आसन रेशम, कम्बल, काठ या कुशा का होना चाहिए, और लोहे का आसन वर्जित है।

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