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अपसव्य प्रश्नोत्तरी — 10 प्रश्न

शास्त्रों और पुराणों पर आधारित अपसव्य विषय के प्रामाणिक प्रश्न-उत्तर — कुल 10 प्रश्न

लोक

दशमी श्राद्ध में अपसव्य क्या है?

पितृ कर्म वाला जनेऊ धारण।

अपसव्यजनेऊपितृ कर्म
लोक

दशमी श्राद्ध में जनेऊ कैसे रखें?

जनेऊ दाएँ कंधे पर रखें।

जनेऊअपसव्यश्राद्ध विधि
लोक

नवमी श्राद्ध में जनेऊ कैसे रखें?

जनेऊ दाहिने कंधे पर रखें।

जनेऊअपसव्यपितृ कर्म
लोक

पितृ कार्य में जनेऊ कैसे रखें?

पितृ कार्य में जनेऊ अपसव्य रखें।

पितृ कार्यजनेऊअपसव्य
लोक

सव्य और अपसव्य क्या है?

देव कार्य में सव्य, पितृ कार्य में अपसव्य होता है।

सव्यअपसव्यजनेऊ
श्राद्ध विधि

दूज श्राद्ध किस दिशा में करें?

दूज श्राद्ध दक्षिण-पश्चिम यानी नैऋत्य कोण की दिशा में मुख करके करना चाहिए। साथ ही कर्ता का जनेऊ अपसव्य अवस्था में दाएँ कंधे पर होना चाहिए। आसन रेशम, कम्बल, काठ यानी लकड़ी या कुशा का होना चाहिए। लोहे का आसन सर्वथा वर्जित है। दक्षिण दिशा यमलोक और पितृलोक की दिशा है, इसलिए नैऋत्य पितृ-कर्म के लिए शास्त्र-सम्मत है।

दूज श्राद्ध दिशानैऋत्य कोणदक्षिण-पश्चिम
श्राद्ध विधि

अपसव्य का अर्थ क्या है?

अपसव्य वह अवस्था है जिसमें जनेऊ दाएं कंधे पर और बाएं हाथ के नीचे रखा जाता है। यह पितृ कार्य अर्थात् श्राद्ध, तर्पण और पिण्डदान के समय की विशेष अवस्था है। अप विपरीत और सव्य बाएं से बना यह शब्द है, अर्थात् सव्य का उलट या दाएं ओर। यह देव कार्य की सव्य अवस्था से भिन्न है।

अपसव्यजनेऊ अवस्थापितृ कार्य
श्राद्ध विधि

यज्ञोपवीत (जनेऊ) श्राद्ध में कैसे पहनें?

श्राद्ध में जनेऊ अपसव्य अवस्था में पहना जाता है, अर्थात् दाएं कंधे पर और बाएं हाथ के नीचे। यह देव कार्य के सव्य बाएं कंधे पर से भिन्न है। शास्त्रों ने इसे अत्यंत महत्त्वपूर्ण कहा है। पितरों का तर्पण इसी अवस्था में किया जाता है।

जनेऊअपसव्ययज्ञोपवीत
लोक

देव कार्य और पितृ कार्य की जनेऊ मुद्रा में क्या अंतर है?

देव कार्य में सव्य, पितृ कार्य में अपसव्य और ऋषि तर्पण में निवीत मुद्रा रखी जाती है।

जनेऊ मुद्रादेव कार्यपितृ कार्य
लोक

पितृ कार्य में अपसव्य मुद्रा क्यों रखी जाती है?

पितृ कार्य में जनेऊ दाएँ कंधे पर रखी जाती है, जिसे अपसव्य मुद्रा कहा जाता है।

अपसव्यजनेऊपितृ कार्य

विषय-वार प्रश्नोत्तर

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सनातन धर्म प्रश्नोत्तरी — शास्त्रीय ज्ञान

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