विस्तृत उत्तर
श्राद्ध में यज्ञोपवीत अर्थात् जनेऊ एक विशेष अवस्था में पहना जाता है, जो देव कार्य से भिन्न है। शास्त्रीय आधार के अनुसार श्राद्ध विधि में यज्ञोपवीत की स्थिति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। देव कार्य में जनेऊ बाएं कंधे पर सव्य अवस्था में रहता है, परंतु पितरों का तर्पण करते समय जनेऊ को दाएं कंधे पर और बाएं हाथ के नीचे रखा जाता है, और इस अवस्था को अपसव्य कहा जाता है।
जनेऊ की दो अवस्थाएँ हैं। पहली अवस्था है सव्य, जो देव कार्य के लिए है, जिसमें जनेऊ बाएं कंधे पर रहता है। यह सामान्य पूजा-पाठ और शुभ कार्यों में पहना जाता है। दूसरी अवस्था है अपसव्य, जो पितृ कार्य के लिए है, जिसमें जनेऊ दाएं कंधे पर रहता है, और बाएं हाथ के नीचे आता है। यह श्राद्ध-तर्पण में पहना जाता है।
श्राद्ध में जनेऊ की स्थिति का नाम अपसव्य है। इसका विवरण यह है कि जनेऊ को दाएं कंधे पर रखें, फिर इसे बाएं हाथ के नीचे लाएँ, अर्थात् यह दाएं कंधे से गुज़रकर बाएं हाथ के नीचे आता है। अपसव्य अवस्था का चयन कई कारणों से किया गया है। पहला कारण है पितृ कार्य की विशिष्टता, क्योंकि पितृ कार्य देव कार्य से अलग है, और जनेऊ की स्थिति भी अलग होनी चाहिए। दूसरा कारण है शास्त्रीय भेद, क्योंकि शास्त्रों ने स्पष्ट भेद किया है, और गलत स्थिति में श्राद्ध अधूरा रहता है। तीसरा कारण है परंपरा, क्योंकि यह सनातन धर्म की प्राचीन परंपरा है, और वेदों तथा पुराणों में इसका स्पष्ट उल्लेख है।
देव कार्य और पितृ कार्य की तुलना देखें तो देव कार्य में दिशा पूर्व या उत्तर होती है और जनेऊ सव्य अवस्था में बाएं कंधे पर रहता है। पितृ कार्य अर्थात् श्राद्ध में दिशा दक्षिण होती है और जनेऊ अपसव्य अवस्था में दाएं कंधे पर रहता है। यहाँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण शब्द का अर्थ यह है कि शास्त्रों ने इसे अत्यंत महत्त्वपूर्ण कहा है, अर्थात् यह सूक्ष्म लेकिन अनिवार्य नियम है, और इसके बिना श्राद्ध अधूरा रह जाता है।
व्यावहारिक मार्गदर्शन के अनुसार श्राद्ध आरंभ से पहले पहले स्नान कर शुद्ध हो जाएँ, फिर श्वेत धोती पहनें, फिर जनेऊ को बाएं कंधे से दाएं कंधे पर ले जाएँ अर्थात् अपसव्य कर लें, फिर अनामिका में पवित्री पहनें, फिर दक्षिण की ओर मुख रखकर बैठें, और श्राद्ध आरंभ करें। श्राद्ध समाप्त होने पर जनेऊ को वापस सव्य अवस्था में बाएं कंधे पर ले आना चाहिए, और सामान्य जीवन में लौटना चाहिए। श्राद्धकर्ता की पूर्ण तैयारी में पाँच बातें शामिल हैं, स्नान अर्थात् पूर्ण शुद्धि, श्वेत धोती, पवित्री अनामिका में, जनेऊ अपसव्य, और दक्षिण मुख। शास्त्रीय स्रोत के रूप में आश्वलायन गृह्यसूत्र, गरुड़ पुराण और याज्ञवल्क्य स्मृति में श्राद्ध की सूक्ष्म विधि का विस्तार से वर्णन है। यह सूक्ष्म नियम सिद्ध करता है कि सनातन धर्म देव कार्य और पितृ कार्य को स्पष्ट रूप से भिन्न मानता है, और दिशा, जनेऊ, मंत्र, हर पहलू अलग होता है। निष्कर्षतः श्राद्ध में जनेऊ अपसव्य अवस्था में पहना जाता है, अर्थात् दाएं कंधे पर और बाएं हाथ के नीचे, जो देव कार्य के सव्य बाएं कंधे से भिन्न है, और शास्त्रों ने इसे अत्यंत महत्त्वपूर्ण कहा है।
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