विस्तृत उत्तर
द्वितीया श्राद्ध दिन के अपराह्न काल में, विशेषकर कुतप मुहूर्त, रौहिण मुहूर्त, या अपराह्न समय में करना चाहिए। शास्त्रीय आधार के अनुसार श्राद्ध कभी भी प्रातःकाल या रात्रिकाल में नहीं किया जाता। द्वितीया श्राद्ध के लिए अपराह्न का समय ही शास्त्र-सम्मत है। हिन्दू दिनमान यानी सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को 15 मुहूर्तों में विभाजित किया गया है। श्राद्ध के लिए दिन का आठवाँ और नौवाँ मुहूर्त सर्वोत्तम माना गया है।
द्वितीया श्राद्ध के तीन प्रमुख समय इस प्रकार हैं। पहला समय है कुतप मुहूर्त। यह दिन का आठवाँ मुहूर्त है। अनुमानित समय 11:36 AM से 12:24 PM तक होता है। यह श्राद्ध का सर्वश्रेष्ठ समय है। दूसरा समय है रौहिण मुहूर्त। यह दिन का नौवाँ मुहूर्त है। अनुमानित समय 12:24 PM से 01:12 PM तक होता है। तीसरा समय है अपराह्न काल। यह 01:12 PM से 03:39 PM तक होता है। सम्पूर्ण श्राद्ध प्रक्रिया इस काल के समाप्त होने से पूर्व पूर्ण हो जानी चाहिए।
कुतप मुहूर्त का अर्थ अत्यंत विशेष है। कु अर्थात् पाप, तप अर्थात् जलाना। जो मुहूर्त पापों को भस्म कर दे, वह कुतप है। यह नाम ही इस मुहूर्त की महिमा को दर्शाता है। कुतप समय में किया गया श्राद्ध न केवल पितरों को तृप्त करता है, बल्कि कर्ता के पापों को भी जला देता है। इसीलिए यह श्राद्ध का सर्वश्रेष्ठ समय है।
रौहिण मुहूर्त की विशेषता भी अद्वितीय है। यह कुतप के तुरन्त बाद आता है, और कुतप के पश्चात् यह भी श्राद्ध कर्म के लिए अत्यंत पवित्र है। रौहिण नाम का सम्बन्ध रोहिणी यानी चन्द्रमा की पत्नी से है। यह मुहूर्त शुद्धता और स्थिरता का प्रतीक है।
अपराह्न काल का सम्पूर्ण समय भी पवित्र है। यह दिन का तीसरा प्रहर माना जाता है, जब सूर्य दक्षिण की ओर ढलने लगता है। दक्षिण दिशा पितृलोक की दिशा है, इसलिए अपराह्न काल पितृ-कर्म के लिए स्वाभाविक रूप से उपयुक्त है।
स्थानीय परिवर्तन भी ध्यातव्य हैं। उपर्युक्त समय स्थानीय सूर्यास्त के अनुसार परिवर्तित हो सकते हैं। उत्तर भारत और दक्षिण भारत में सूर्य का उदय और अस्त समय अलग होता है, इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार ही सटीक मुहूर्त निर्धारित करना चाहिए।
प्रातः और सायं वर्जित हैं। श्राद्ध कभी भी प्रातःकाल या रात्रिकाल में नहीं किया जाता। प्रातःकाल में देव-कार्यों का समय है, और रात्रि में राक्षस-शक्तियाँ सक्रिय होती हैं। दोनों ही समय पितृ-कर्म के लिए उपयुक्त नहीं हैं। केवल अपराह्न ही शास्त्र-सम्मत है।
दोपहर के समय का दार्शनिक आधार भी है। दोपहर वह समय है जब सूर्य अपने उच्च स्थान पर होता है, और फिर ढलने लगता है। यह जीवन के मध्य से अंत की ओर बढ़ने का प्रतीक है। पितर भी जीवन के बाद की अवस्था में हैं, इसलिए इस समय उन्हें श्रद्धांजलि देना उपयुक्त है।
यदि किसी कारण से कुतप या रौहिण मुहूर्त नहीं मिल पाता, तो अपराह्न काल में श्राद्ध करना चाहिए। मुख्य बात यह है कि श्राद्ध सूर्यास्त से पहले समाप्त हो जाए। सायंकाल या रात्रि में श्राद्ध सर्वथा वर्जित है।
श्राद्ध के विभिन्न अंग भी इसी समय में पूर्ण होने चाहिए। पहला अंग है पञ्चबलि, जो ब्राह्मण भोजन से ठीक पूर्व निकाली जाती है। दूसरा अंग है अग्नौकरण, जिसमें अग्नि में तीन आहुतियाँ दी जाती हैं। तीसरा अंग है पिण्डदान, जिसमें कुशाओं पर पितरों के गोत्र और नाम के साथ पिण्ड अर्पित किए जाते हैं। चौथा अंग है ब्राह्मण भोजन, जिसमें सुपात्र ब्राह्मणों को सात्विक हविष्यान्न का भोजन कराया जाता है। ये सब क्रिया अपराह्न काल के समाप्त होने से पूर्व पूर्ण हो जानी चाहिए।
निर्णयसिन्धु का स्पष्ट निर्देश भी है। निर्णयसिन्धु के अनुसार श्राद्ध का मुख्य काल अपराह्न है। यदि द्वितीया तिथि दिन में इन मुहूर्तों को स्पर्श नहीं करती है, तो धर्मसिन्धु के नियमों के अनुसार तिथि का निर्णय किया जाता है। ऐसी स्थिति में जिस दिन अपराह्न काल में द्वितीया का स्पर्श अधिक हो, उसी दिन श्राद्ध करना चाहिए। शास्त्रीय आधार के रूप में निर्णयसिन्धु, धर्मसिन्धु, याज्ञवल्क्य स्मृति और गरुड़ पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः द्वितीया श्राद्ध दिन के अपराह्न काल में करना चाहिए। सबसे श्रेष्ठ समय है कुतप मुहूर्त 11:36 AM से 12:24 PM, फिर रौहिण मुहूर्त 12:24 PM से 01:12 PM, और अपराह्न काल 01:12 PM से 03:39 PM तक। प्रातः और रात्रि में श्राद्ध सर्वथा वर्जित है।
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