विस्तृत उत्तर
विश्वेदेव की स्थापना पार्वण श्राद्ध में इसलिए अनिवार्य है क्योंकि वे हवि को पितरों तक पहुँचाने में सहायक होते हैं और श्राद्ध को सम्पूर्ण बनाते हैं। शास्त्रीय आधार के अनुसार महालय के इस द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों यानी पुरूरवा और आर्द्रव अथवा क्रतु और दक्ष की स्थापना अनिवार्य होती है।
विश्वेदेव की अनिवार्य स्थापना के पाँच मुख्य कारण हैं। पहला कारण है शास्त्र-विधान। शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश है कि महालय के द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों की स्थापना अनिवार्य होती है। यह केवल विकल्प नहीं है, बल्कि कर्तव्य है। दूसरा कारण है पार्वण की पूर्णता। पार्वण श्राद्ध की मूल विशेषता तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन और विश्वेदेवों की स्थापना है। दोनों मिलकर पार्वण को सम्पूर्ण बनाते हैं। बिना विश्वेदेवों के पार्वण अधूरा रह जाता है।
तीसरा कारण है हवि का पितरों तक पहुँचना। विश्वेदेव श्राद्ध में अर्पित हवि को सूक्ष्म रूप में पितरों तक पहुँचाने में सहायक होते हैं। पितर वायु रूप में आते हैं, और विश्वेदेव हवि को उन तक पहुँचाने का माध्यम बनते हैं।
चौथा कारण है पितरों के साथ देवताओं की उपस्थिति। श्राद्ध केवल पितरों का अनुष्ठान नहीं है, बल्कि एक सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय यज्ञ है। इसमें पितरों के साथ देवता भी आहूत होने चाहिए। विश्वेदेव यह कार्य करते हैं। पाँचवाँ कारण है यमराज की प्रसन्नता। पद्म पुराण के अनुसार द्वितीया तिथि पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है। विश्वेदेवों की स्थापना से यमराज भी प्रसन्न होते हैं।
विश्वेदेवों के बिना श्राद्ध की हानि क्या होती है, इसका भी निर्देश है। यदि विश्वेदेवों की स्थापना नहीं की जाए, तो पार्वण श्राद्ध सम्पूर्ण नहीं माना जाता। हवि पितरों तक सूक्ष्म रूप में नहीं पहुँच पाती। पितर अधूरी तृप्ति पाते हैं, और श्राद्ध का पूर्ण फल नहीं मिलता।
विश्वेदेवों की भूमिका को गरुड़ पुराण से समझें। गरुड़ पुराण के प्रेत खण्ड अध्याय 10 के अनुसार जब वंशज देश, काल और पात्र का विचार करके उचित मन्त्रों के साथ श्राद्ध करता है, तो वे वेद मन्त्र और गोत्र-नाम उस अन्न को एक सूक्ष्म ऊर्जा में परिवर्तित कर देते हैं। यह सूक्ष्म ऊर्जा विश्वेदेवों के माध्यम से पितरों तक पहुँचती है। यानी विश्वेदेव माध्यम हैं, जो हवि के रूपान्तरण और प्रेषण में भाग लेते हैं।
विश्वेदेवों का दार्शनिक महत्व भी विशेष है। श्राद्ध एक ऐसा कर्म है जो लौकिक और पारलौकिक दोनों लोकों को जोड़ता है। वंशज लौकिक है, पितर पारलौकिक हैं। विश्वेदेव दोनों के बीच की कड़ी हैं। बिना इनके यह कड़ी टूट जाती है।
पुरूरवा-आर्द्रव की जोड़ी का विशेष कारण है। महाराज पुरुरवा एक चन्द्रवंशी सम्राट थे, जिन्होंने पितरों की आकांक्षा को पूरा कर विधिपूर्वक श्राद्ध संपन्न किया था। उनकी विशेष भक्ति के कारण उन्हें विश्वेदेवों में स्थान मिला। आर्द्रव उनके सहचर देवता हैं। यह जोड़ी श्राद्ध की सर्वश्रेष्ठ भावना का प्रतीक है।
क्रतु-दक्ष की जोड़ी का भी विशेष कारण है। क्रतु एक प्राचीन ऋषि थे, और दक्ष एक महान प्रजापति थे। ये दोनों यज्ञ-कर्म के विशेष ज्ञाता थे। श्राद्ध भी एक यज्ञ है, इसलिए इन दोनों की उपस्थिति श्राद्ध को यज्ञ-स्वरूप बनाती है।
विश्वेदेवों और अधिष्ठाता देवताओं का सम्मिलित कार्य अद्वितीय है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.268 के अनुसार श्राद्ध के मूल अधिष्ठाता देवता वसु, रुद्र और आदित्य हैं। ये तीन पीढ़ियों के प्रतिनिधि हैं। विश्वेदेव इनके सहायक हैं। दोनों मिलकर श्राद्ध को पूर्ण बनाते हैं।
विश्वेदेवों की स्थापना की विधि भी विशेष है। श्राद्ध की वेदी पर विश्वेदेवों के लिए अलग आसन और अर्पण की व्यवस्था होती है। उन्हें भी हवि अर्पित की जाती है, और मन्त्रों से उनका आवाहन किया जाता है। फिर पितरों के साथ उनकी भी पूजा की जाती है।
विश्वेदेवों की प्रसन्नता का व्यापक प्रभाव है। जब विश्वेदेव प्रसन्न होते हैं, तो वे न केवल हवि को पितरों तक पहुँचाते हैं, बल्कि वंशज को भी विशेष आशीर्वाद देते हैं। श्राद्ध से जो फल मिलते हैं - आयु, सन्तान, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख, राज्य - उनमें विश्वेदेवों की भूमिका भी होती है।
इस अनिवार्यता का सर्वोच्च संदेश यह है कि सनातन धर्म में हर अनुष्ठान सम्पूर्ण होना चाहिए। श्राद्ध में पितरों के साथ देवताओं की उपस्थिति इसी सम्पूर्णता का प्रतीक है। विश्वेदेवों की स्थापना से यह सम्पूर्णता प्राप्त होती है, और श्राद्ध एक महायज्ञ बन जाता है।
एकोद्दिष्ट और पार्वण का मुख्य अंतर भी इसी पर है। एकोद्दिष्ट में विश्वेदेवों की स्थापना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि वह एक सरल व्यक्तिगत श्राद्ध है। पार्वण में अनिवार्य है, क्योंकि वह एक सम्पूर्ण सामूहिक श्राद्ध है। यह अंतर पार्वण की महिमा को दर्शाता है। शास्त्रीय आधार के रूप में श्राद्ध-तत्त्व, धर्मसिन्धु, याज्ञवल्क्य स्मृति, विष्णु पुराण और गरुड़ पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः विश्वेदेव की स्थापना पार्वण श्राद्ध में इसलिए अनिवार्य है क्योंकि वे हवि को पितरों तक पहुँचाने में सहायक हैं, श्राद्ध को सम्पूर्ण बनाते हैं, और शास्त्र-विधान के अनुसार यह पार्वण की मूल आवश्यकता है। बिना इनके श्राद्ध अधूरा रह जाता है, और पितरों को पूर्ण तृप्ति नहीं मिलती।
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