विस्तृत उत्तर
श्राद्ध में कुछ चीज़ें सर्वथा वर्जित मानी गई हैं। शास्त्रीय आधार के अनुसार मसूर की दाल, काला चना, धतूरा, कदम का फूल और बकरे का दूध श्राद्ध में सर्वथा वर्जित है।
श्राद्ध में पाँच प्रमुख वर्जित चीज़ें इस प्रकार हैं। पहली वर्जित चीज़ है मसूर की दाल। दूसरी वर्जित चीज़ है काला चना। तीसरी वर्जित चीज़ है धतूरा। चौथी वर्जित चीज़ है कदम का फूल। पाँचवीं वर्जित चीज़ है बकरे का दूध। इन सभी का श्राद्ध में प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।
यहाँ सर्वथा वर्जित शब्द का विशेष महत्व है। सर्वथा का अर्थ है पूरी तरह, हर तरह से। अर्थात् ये चीज़ें श्राद्ध में किसी भी रूप में प्रयोग नहीं की जा सकतीं। न पिण्ड में, न तर्पण में, न ब्राह्मण भोजन में।
इसके विपरीत श्राद्ध में कुछ चीज़ें अत्यंत प्रिय और अनुमत हैं। विष्णु पुराण और मत्स्य पुराण के अनुसार पितरों को तिल, कुशा, गाय का दूध, शहद, जौ और सफेद फूल अत्यंत प्रिय हैं। इसलिए श्राद्ध में मसूर की दाल के बजाय जौ का प्रयोग किया जाना चाहिए, काले चने के बजाय अन्य अनुमत अन्न का प्रयोग होना चाहिए, धतूरे और कदम के फूल के बजाय सफेद फूल का प्रयोग होना चाहिए, और बकरे के दूध के बजाय गाय के दूध का प्रयोग किया जाना चाहिए।
श्राद्ध में पशु-हिंसा और मांसाहार भी पूर्णतः वर्जित है। श्रीमद्भागवत महापुराण के सप्तम स्कन्ध के 14वें और 15वें अध्याय में देवर्षि नारद महाराज युधिष्ठिर को गृहस्थ धर्म और मोक्ष धर्म का उपदेश देते हुए श्राद्ध के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन करते हैं। भागवत पुराण श्राद्ध में पशु-हिंसा और मांसाहार का पूर्णतः निषेध करता है।
देवर्षि नारद स्पष्ट करते हैं कि धर्म का वास्तविक मर्म जानने वाला पुरुष श्राद्ध में भूलकर भी मांस का अर्पण न करे और न ही स्वयं उसका भक्षण करे। पितरों को मुनियों के योग्य पवित्र हविष्यान्न अर्थात् सात्त्विक अन्न, दूध, घी, कंद-मूल से जो अलौकिक प्रसन्नता और तृप्ति प्राप्त होती है, वह पशुबलि या किसी जीव की हत्या से प्राप्त अन्न से कभी नहीं हो सकती। इसलिए श्राद्ध में सात्त्विक भोजन और सामग्री का ही प्रयोग होना चाहिए।
श्राद्ध में अन्य आडंबर भी वर्जित हैं। भागवत यह भी उपदेश देता है कि श्राद्ध में धन का अहंकार नहीं होना चाहिए, और अत्यधिक विस्तार या आडंबर करने से श्रद्धा, पात्र और देश-काल का संतुलन बिगड़ जाता है। श्राद्ध में हव्य-कव्य का दान भगवान के भक्तों, ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मणों या योगियों को ही देना चाहिए।
धन की शुद्धता का भी ध्यान रखना आवश्यक है। विष्णु पुराण इस बात पर सर्वाधिक बल देता है कि श्राद्ध सदैव न्याय और ईमानदारी से कमाए गए धन से ही किया जाना चाहिए। मार्कण्डेय और विष्णु पुराण के अनुसार, अन्याय, छल-कपट या भ्रष्टाचार से अर्जित धन से किया गया श्राद्ध पितरों को स्वर्ग नहीं पहुँचाता, बल्कि वह नीच योनियों में पड़े जीवों को प्राप्त होता है, और पितर क्षुधा से पीड़ित रहते हैं।
शास्त्रीय आधार के रूप में विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण, श्रीमद्भागवत महापुराण, मार्कण्डेय पुराण और याज्ञवल्क्य स्मृति इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः श्राद्ध में मसूर की दाल, काला चना, धतूरा, कदम का फूल और बकरे का दूध सर्वथा वर्जित हैं। साथ ही पशु-हिंसा, मांसाहार, अत्यधिक आडंबर, और बेईमानी के धन से किया गया श्राद्ध भी पूर्णतः वर्जित है।
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