विस्तृत उत्तर
पार्वण श्राद्ध में तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन होता है। शास्त्रीय आधार के अनुसार पार्वण श्राद्ध में एक साथ तीन पीढ़ियों यानी पिता, पितामह, प्रपितामह तथा माता पक्ष यानी मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह का सतीक यानी पत्नी सहित आवाहन किया जाता है।
इस आवाहन के दो मुख्य पक्ष हैं। पहला पक्ष है पितृ कुल। पितृ कुल से तीन पीढ़ियों का आवाहन होता है। पहली पीढ़ी पिता है, दूसरी पीढ़ी पितामह यानी दादा है, और तीसरी पीढ़ी प्रपितामह यानी परदादा है। ये तीनों कर्ता के पिता-कुल के तीन पूर्व पीढ़ी हैं।
दूसरा पक्ष है मातृ कुल। मातृ कुल से भी तीन पीढ़ियों का आवाहन होता है। पहली पीढ़ी मातामह यानी नाना है, दूसरी पीढ़ी प्रमातामह यानी परनाना है, और तीसरी पीढ़ी वृद्धप्रमातामह यानी वृद्ध परनाना है। ये तीनों कर्ता के माता-कुल के तीन पूर्व पीढ़ी हैं।
सतीक आवाहन का अर्थ देखें तो स का अर्थ है साथ, और तीक का अर्थ है पत्नी। सतीक यानी पत्नी सहित। प्रत्येक पुरुष पितर का आवाहन उनकी पत्नी सहित किया जाता है। यानी पिता के साथ माता, पितामह के साथ पितामही, प्रपितामह के साथ प्रप्रपितामही, मातामह के साथ मातामही, प्रमातामह के साथ प्रमातामही, और वृद्धप्रमातामह के साथ वृद्धप्रमातामही - सब पत्नियों के साथ आहूत होते हैं।
इस तरह पार्वण में कुल मिलाकर बारह पितरों का आवाहन होता है। पितृ पक्ष से तीन पुरुष पितर और उनकी तीन पत्नियाँ - यानी छह। मातृ पक्ष से तीन पुरुष पितर और उनकी तीन पत्नियाँ - यानी छह। दोनों मिलाकर कुल बारह।
तीन पीढ़ियों का चयन क्यों है, इसका भी शास्त्रीय आधार है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.268 के अनुसार श्राद्ध के मूल अधिष्ठाता देवता वसु, रुद्र और आदित्य हैं। ये तीनों देवता तीन पीढ़ियों के प्रतिनिधि के रूप में हव्य-कव्य को ग्रहण करते हैं। वसु पिता पीढ़ी का, रुद्र पितामह पीढ़ी का, और आदित्य प्रपितामह पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
भगवान वराह की कथा भी इसी से जुड़ी है। महाभारत के शांतिपर्व और अन्य वैदिक संहिताओं के अनुसार पिण्डदान की पवित्र परम्परा स्वयं भगवान विष्णु के वराह अवतार द्वारा प्रारंभ की गई थी। उन्होंने तीन गोल पिण्डों का निर्माण किया और घोषित किया कि ये तीन पिण्ड क्रमशः पिता, पितामह और प्रपितामह के शाश्वत प्रतीक माने जाएं। इसी कारण आज भी पार्वण में तीन पीढ़ियों का आवाहन होता है।
पीढ़ी-व्यवस्था का दार्शनिक अर्थ है। तीन पीढ़ियों का सिद्धांत यह दर्शाता है कि वंशज और पितर एक सतत श्रृंखला में बंधे हैं। हर पीढ़ी अपनी तीन पूर्व पीढ़ियों से सीधे जुड़ी होती है। इसके आगे की पीढ़ियाँ मुक्त हो जाती हैं, क्योंकि उनके लिए श्राद्ध करने वाला सीधा वंशज पास नहीं रहता।
सपिण्डीकरण के बाद पीढ़ी-परिवर्तन का चक्र चलता है। जब किसी पितर का सपिण्डीकरण होता है, तो वह तीन पीढ़ियों में स्थान पाता है। साथ ही, सबसे पुराने पितर तीन पीढ़ियों के दायरे से बाहर हो जाते हैं। यह एक स्वाभाविक चक्र है।
मातृ कुल का आवाहन भी विशेष महत्वपूर्ण है। पार्वण श्राद्ध में केवल पितृ कुल नहीं, बल्कि मातृ कुल भी आहूत होता है। यह दर्शाता है कि सनातन धर्म में दोनों कुलों का सम्मान है। माता का कुल भी वंशज का अपना है, और उसके पितरों के लिए भी श्राद्ध करना उसका कर्तव्य है।
पिण्डदान का सम्बन्ध भी इसी आवाहन से है। पार्वण में तीन पिण्ड बनते हैं। एक पिण्ड पिता, पितामह और प्रपितामह के लिए। साथ ही माता पक्ष के लिए भी पिण्ड बनाए जाते हैं। पिण्ड कुशा पर रखकर पितरों के गोत्र और नाम का उच्चारण करते हुए अर्पित किए जाते हैं।
विश्वेदेवों का स्थान भी विशेष है। महालय के इस द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों यानी पुरूरवा और आर्द्रव अथवा क्रतु और दक्ष की स्थापना अनिवार्य होती है। तीन पीढ़ियों के पितरों के साथ विश्वेदेव भी आहूत होते हैं। ये देवता हवि को पितरों तक पहुँचाने में सहायक हैं।
इस आवाहन का दिव्य प्रभाव यह है कि एक ही श्राद्ध से सब पितर तृप्त होते हैं। पितृ कुल की तीन पीढ़ियाँ अपनी पत्नियों सहित, मातृ कुल की तीन पीढ़ियाँ अपनी पत्नियों सहित, विश्वेदेव और श्राद्ध के अधिष्ठाता वसु, रुद्र, आदित्य - सब एक साथ तृप्त होते हैं। यह पार्वण की सर्वोच्च विशेषता है।
यह सम्पूर्ण सूक्ष्म प्रक्रिया है। पितर वायु रूप में आते हैं, मन्त्रों और गोत्र-नाम की शक्ति से हवि को सूक्ष्म ऊर्जा में बदला जाता है, और सब पितरों तक पहुँचाया जाता है। यह सिद्ध करता है कि पार्वण श्राद्ध एक अत्यंत वैज्ञानिक और दिव्य प्रक्रिया है। शास्त्रीय आधार के रूप में याज्ञवल्क्य स्मृति, श्राद्ध-तत्त्व, धर्मसिन्धु, महाभारत शांतिपर्व और गरुड़ पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः पार्वण श्राद्ध में तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन होता है। पितृ पक्ष से पिता, पितामह, प्रपितामह और मातृ पक्ष से मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह - सब अपनी पत्नियों के साथ आहूत होते हैं। कुल मिलाकर बारह पितरों का आवाहन होता है।
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