पौष शुक्ल पुत्रदा एकादशी की संपूर्ण, पारंपरिक एवं अक्षुण्ण व्रत-कथा
पारंपरिक प्रारंभ: धर्मराज युधिष्ठिर एवं भगवान श्रीकृष्ण का पावन संवाद
सनातन धर्म के प्राचीन और पवित्र आख्यानों में एकादशी व्रत का स्थान सर्वोपरि है । पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार, स्वयं देवाधिदेव भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम भक्त और धर्म के अवतार महाराज युधिष्ठिर के समक्ष एकादशी तिथियों के महात्म्य और उनकी व्रत-कथाओं का अत्यंत विस्तारपूर्वक वर्णन किया है । पौष मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली 'पुत्रदा एकादशी' की यह पावन कथा भी इसी ईश्वरीय संवाद का एक पवित्र अंग है, जिसे भविष्योत्तर पुराण और पद्म पुराण के अंतर्गत अत्यंत श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता है । इस कथा का आरंभ धर्मराज युधिष्ठिर की धर्ममयी जिज्ञासा और त्रिलोकीनाथ भगवान श्रीकृष्ण के करुणापूर्ण उपदेश से होता है।
कथा के पारंपरिक और पौराणिक आरंभ में, धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने दोनों हाथ जोड़कर, अत्यंत भक्तिभाव और विनयपूर्वक भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, "हे प्रभो! हे त्रिलोकीनाथ! हे जगदीश्वर! आपने पौष मास के कृष्ण पक्ष की सफला एकादशी का महात्म्य बताकर मुझ पर और संपूर्ण मानव जाति पर बड़ी कृपा की है । आपके श्रीमुख से उस पावन कथा का श्रवण कर मेरा हृदय अत्यंत तृप्त हुआ है। अब आप कृपा करके मुझे पौष मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी के विषय में भी विस्तारपूर्वक बताइए । हे जनार्दन! पौष मास के शुक्ल पक्ष की उस एकादशी का क्या नाम है? उस एकादशी के व्रत का क्या विधान है? व्रत करने का सही तरीका क्या है? इस पवित्र दिन किस देवता का पूजन किया जाता है और इस व्रत को करने से किस विशेष फल की प्राप्ति होती है? हे माधव! कृपया यह सब विधानपूर्वक और सविस्तार मुझसे कहिए, ताकि मैं और आने वाली पीढ़ियाँ इसका लाभ प्राप्त कर सकें" ।
धर्मराज युधिष्ठिर की इस जन-कल्याणकारी और धर्ममयी जिज्ञासा को सुनकर भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए। भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, "हे राजन्! हे धर्मराज! तुम्हारी यह जिज्ञासा अत्यंत उत्तम है। मैं इस चराचर जगत के कल्याण के लिए इस परम पवित्र एकादशी के व्रत और उसकी कथा का वर्णन करता हूँ, तुम एकाग्र चित्त होकर इसे ध्यानपूर्वक सुनो । हे युधिष्ठिर! पौष मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका नाम 'पुत्रदा एकादशी' है । इस परम पावन एकादशी के दिन देवदेवेश्वर भगवान नारायण (श्रीहरि विष्णु) की पूर्ण विधि-विधान से पूजा की जाती है । इस व्रत को अत्यंत नियम और निष्ठा के साथ करना चाहिए। हे राजन्! इस चराचर संसार में पुत्रदा एकादशी के व्रत के समान फलदायी दूसरा कोई व्रत नहीं है । जो मनुष्य इस एकादशी का व्रत करता है, वह इसके महान पुण्य के प्रभाव से तपस्वी, विद्वान और लक्ष्मीवान होता है । जो दंपत्ति संतान सुख से वंचित हैं, उनके लिए यह व्रत अत्यंत कल्याणकारी और मनोवांछित फल (पुत्र-रत्न) प्रदान करने वाला है । हे युधिष्ठिर! इस पुत्रदा एकादशी की एक अत्यंत प्राचीन, प्रामाणिक और पावन कथा है, जो इसके महात्म्य को सिद्ध करती है। मैं तुम्हें वही कथा सुनाता हूँ, तुम इसे ध्यानपूर्वक सुनो।" ।
मुख्य कथा: भद्रावती नरेश राजा सुकेतुमान का आख्यान
भद्रावती नगरी का वर्णन और राजा सुकेतुमान का परिचय
प्राचीन काल में इस पृथ्वी पर 'भद्रावती' नाम की एक अत्यंत सुंदर, समृद्ध और विशाल नगरी हुआ करती थी । वह नगरी धन-धान्य, सुख-समृद्धि और हर प्रकार के ऐश्वर्य से परिपूर्ण थी। उस भद्रावती नगरी में सुकेतुमान (जिन्हें कुछ आख्यानों में सुकेतु भी कहा गया है) नाम के एक अत्यंत प्रतापी, धर्मनिष्ठ, कुशल, दानी और बहादुर राजा राज्य करते थे । राजा सुकेतुमान की धर्मपत्नी और उस विशाल राज्य की महारानी का नाम शैव्या था । महारानी शैव्या अत्यंत पतिव्रता, धर्मपरायण और सुसंस्कृत स्त्री थीं।
राजा सुकेतुमान का राज्य हर दृष्टि से संपन्न था। उनके पास विशाल सेना, हाथी, घोड़े, मंत्री, भाई-बंधु और अथाह राजकोष की कोई कमी नहीं थी । राजा अत्यंत न्यायप्रिय थे और अपनी संपूर्ण प्रजा का पालन-पोषण बिल्कुल अपने सगे पुत्रों के समान किया करते थे । उनके सुशासन में प्रजा अत्यंत सुखी थी, राज्य में कहीं कोई रोग, शोक या दरिद्रता नहीं थी। प्रजा अपने राजा से बेहद प्रसन्न रहती थी और राजा भी प्रजा के हित के लिए सदैव तत्पर रहते थे ।
संतानहीनता का घोर दुःख और पितरों की व्यथा
इतने विशाल राज्य, अतुलनीय ऐश्वर्य, अपार धन-संपत्ति और पुनीत कर्मों के स्वामी होने के पश्चात भी राजा सुकेतुमान और रानी शैव्या के जीवन में सुख नहीं था। उनके मन में सदैव एक गहरा, असहनीय और निरंतर शूल की तरह चुभने वाला दुःख निवास करता था । उन दोनों का यह अथाह दुःख उनके निःसंतान (निपुत्री) होने का था । महल का कोई भी वैभव, राज्य का कोई भी सुख और संपत्ति का कोई भी अंश उन्हें शांति प्रदान नहीं कर पाता था । राजा और रानी की कोई संतान न होने के कारण वे दोनों रात-दिन सदैव चिंतित, उदास और गहरे असंतोष में डूबे रहते थे । महारानी शैव्या निपुत्री होने के कारण सदैव चिंता में घुलती रहती थीं ।
केवल राजा सुकेतुमान और महारानी शैव्या ही नहीं, अपितु राजा के दिवंगत पितर (पूर्वज) भी इस स्थिति से अत्यंत व्याकुल, चिंतित और दुखी थे । धार्मिक मान्यताओं और वेदों के अनुसार, निःसंतान व्यक्ति का जीवन व्यर्थ माना गया है; और यदि कोई संतानहीन व्यक्ति अपने पितरों को तर्पण में जल दान देता है, तो उसके पितृगण उस जल को 'गरम जल' (उष्ण जल) के रूप में अत्यंत कष्टपूर्वक ग्रहण करते हैं । राजा सुकेतुमान के पितर भी रो-रोकर राजा द्वारा दिया गया पिंड और तर्पण ग्रहण करते थे । राजा के पितर स्वर्ग में आपस में यह सोचकर अत्यंत शोक करते थे कि सुकेतुमान के बाद इस वंश में उन्हें कौन पिंड देगा और उनका तर्पण कौन करेगा? सुकेतुमान के पश्चात उनका वंश समाप्त हो जाएगा और वे श्राद्ध तथा तर्पण से वंचित होकर पतन को प्राप्त होंगे ।
राजा सुकेतुमान को अपने भाई, बंधु, अपार धन, विशाल हाथी, तेज़ घोड़े, विस्तृत राज्य और चतुर मंत्रियों में से किसी भी वस्तु से तनिक भी संतोष प्राप्त नहीं होता था । राजा के मन में दिन-रात बस एक ही विचार चलता रहता था कि "मेरे मरने के बाद मेरा अंतिम संस्कार कौन करेगा? मेरा पिंडदान कौन करेगा? बिना पुत्र के मैं पितृ-ऋण, देव-ऋण और ऋषि-ऋण कैसे चुका सकूँगा?" । राजा गहरे विषाद में सोचते थे कि जिस घर में पुत्र न हो, उस घर में सदैव अँधेरा ही रहता है । इसलिए, किसी भी प्रकार से पुत्र उत्पत्ति के लिए उन्हें हर संभव यत्न करना चाहिए । उनका दृढ़ विश्वास था कि जिस भाग्यशाली मनुष्य ने अपने जीवन में पुत्र का मुख देखा है, वह इस संसार में अत्यंत धन्य है; उसे इस लोक में अक्षय यश प्राप्त होता है और परलोक में चिरकालिक शांति मिलती है, अर्थात् उसके दोनों लोक (इहलोक और परलोक) सुधर जाते हैं । राजा जानते थे कि पूर्व जन्म के उत्तम कर्मों के प्रताप से ही इस जन्म में मनुष्य को पुत्र, धन आदि की प्राप्ति होती है । यह सोच-सोचकर राजा रात-दिन चिंता में ही मग्न रहते थे ।
इस प्रकार चिंता और शोक में दिन बीतते जा रहे थे। जवानी धीरे-धीरे ढल रही थी और बुढ़ापा समीप आ रहा था, परंतु वंश वृद्धि का कोई मार्ग नहीं सूझ रहा था । पुत्र न होने के इसी अपार दुःख और मानसिक क्लेश ने राजा सुकेतुमान की रातों की नींद उड़ा दी थी । राजा इस चिंता में इतने अधिक व्याकुल और अवसादग्रस्त रहने लगे कि कई बार उनके मन में अपने शरीर को त्यागने (आत्महत्या करने) तक के भाव आने लगे थे । परंतु राजा सुकेतुमान धर्म के ज्ञाता और ज्ञानी थे, उन्होंने विचार किया कि आत्महत्या करना शास्त्रों में एक जघन्य महापाप माना गया है, और पाप कर्म से कभी सद्गति प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए उन्होंने अपने मन से यह अनुचित विचार सदा के लिए त्याग दिया ।
प्रजा के मध्य चिंता और परामर्श
पुत्र प्राप्ति के लिए राजा सुकेतुमान ने अनेक प्रकार के दान किए, बड़े-बड़े यज्ञ किए, और ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन से तृप्त किया, फिर भी उन्हें पुत्रोत्पत्ति नहीं हुई । अंततः, राजा ने अपने राज्य के विद्वान ब्राह्मणों और अपनी प्रजाजनों की एक सभा बुलाई और उनसे इस विषय में गहन परामर्श किया। राजा ने अत्यंत दुखी स्वर में कहा, "हे विद्वान ब्राह्मणों! हे मेरे प्रिय प्रजाजनों! मैं तो निःसंतान (संतानहीन) हो गया हूँ। मैंने अपना संपूर्ण जीवन धर्मपूर्वक व्यतीत किया है, प्रजा का पुत्रवत पालन किया है, फिर भी मेरे भाग्य में संतान का सुख नहीं है। अब मेरी क्या गति होगी? मेरा उद्धार कैसे होगा?" । राजा की इस मार्मिक व्यथा को सुनकर संपूर्ण प्रजा और ब्राह्मण अत्यंत दुखी हुए, परंतु किसी के पास भी राजा के इस दुःख का कोई निश्चित और अकाट्य समाधान नहीं था ।
राज्य त्यागकर वनगमन और प्रकृति का अवलोकन
इस अथाह दुःख और घोर निराशा के कारण अब राजा सुकेतुमान का मन अपने राजपाट, राजकाज और महल के सुखों में बिल्कुल नहीं लगता था । उनके मन में वैराग्य उत्पन्न होने लगा। अंततः एक दिन राजा सुकेतुमान अत्यधिक हताश होकर, अपने मंत्रियों, प्रजामंडलों और अपनी पत्नी को भी बिना कुछ बताए, अपने घोड़े पर सवार होकर अकेले ही वन की ओर प्रस्थान कर गए ।
वन में प्रवेश करने के पश्चात राजा सुकेतुमान भटकते हुए आगे बढ़ने लगे। उन्होंने देखा कि वह वन अत्यंत सघन, भयंकर और विस्तृत है । उस महावन में चारों ओर मृग (हिरण), व्याघ्र (बाघ), जंगली सूअर, सिंह, बंदर और सर्प आदि पशु-पक्षी स्वतंत्रतापूर्वक भ्रमण कर रहे हैं । राजा ने देखा कि विशालकाय हाथी अपने छोटे-छोटे बच्चों और हथिनियों के बीच अत्यंत आनंद से घूम रहा है । वन के जानवरों को उनके परिवारों और छोटे बच्चों के साथ अठखेलियाँ करते देखकर राजा सुकेतुमान के हृदय में अपने निःसंतान होने की पीड़ा और अधिक गहरी हो गई । एक ओर पशुओं का पारिवारिक सुख था, और दूसरी ओर चक्रवर्ती राजा का सूनापन।
इस भयंकर वन में कहीं से गीदड़ों के कर्कश स्वर में बोलने की आवाजें आ रही थीं, तो कहीं पेड़ों की डालियों पर बैठे उल्लू अपनी भयानक ध्वनि कर रहे थे । वन के इन विविध, भयानक और रहस्यमयी दृश्यों को देखकर राजा अत्यंत सोच-विचार में निमग्न हो गए । वे घोड़े पर चलते हुए सोचने लगे कि "मैंने अपने जीवन में कई महान यज्ञ किए हैं, ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन कराकर उन्हें तृप्त किया है, प्रजा का सदैव हित किया है, फिर भी मुझे यह संतानहीनता का दारुण दुःख क्यों प्राप्त हुआ? मेरे किस पूर्वकर्म का यह फल है?" ।
मानसरोवर सदृश जलाशय और शुभ शकुनों की प्राप्ति
इसी विचार, शोक और वन-भ्रमण में आधा दिन बीत गया । दोपहर का समय हो गया और सूर्य का ताप बढ़ने लगा। पैदल चलने और वन की कठिन यात्रा के कारण राजा सुकेतुमान को अत्यंत तीव्र भूख और प्यास सताने लगी । अपनी प्यास बुझाने के लिए राजा व्याकुल होकर जल की तलाश में वन में इधर-उधर भटकने लगे ।
तभी, उनके पूर्वजन्म के पुण्यों के उत्तम प्रताप से, थोड़ी दूर आगे जाने पर उन्हें एक अत्यंत सुंदर, निर्मल और स्वच्छ सरोवर दिखाई पड़ा । वह सरोवर अत्यंत विशाल था और मानसरोवर के समान ही पवित्र प्रतीत हो रहा था । वह संपूर्ण सरोवर खिले हुए कमल के पुष्पों से भरा हुआ था और उसमें सारस, हंस तथा अन्य जलचर अत्यंत आनंदपूर्वक विहार कर रहे थे । उस सुंदर सरोवर के चारों ओर अनेक तपस्वी ऋषि-मुनियों ने अपने पवित्र आश्रम बनाए हुए थे ।
जैसे ही राजा सुकेतुमान उस सरोवर और आश्रम के निकट पहुँचे, उनके साथ अत्यंत शुभ शकुन होने लगे । राजा की बाँयी आँख और बायाँ हाथ फड़कने लगा, जो कि शास्त्रों के अनुसार किसी अत्यंत शुभ, मंगलकारी घटना और मनोकामना पूर्ण होने का स्पष्ट संकेत था । इस सुरम्य, शांत और तपोवन के वातावरण को देखकर राजा को अत्यंत मनमोहक अनुभूति हुई और उनके हताश मन को यह आभास हो गया कि अब अवश्य ही कुछ शुभ होने वाला है ।
विश्वेदेव मुनियों से भेंट और संवाद
उन शुभ शकुनों को देखकर और मुनियों का पवित्र दर्शन पाकर राजा सुकेतुमान अत्यंत प्रसन्न हुए । वे तुरंत अपने घोड़े से उतर गए और मुनियों का आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु उनके आश्रम की ओर चल पड़े । वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा कि तेजस्वी मुनिगण सरोवर के तट पर विराजमान हैं। राजा ने अत्यंत आदर, श्रद्धा और शिष्टाचार के साथ उन सभी मुनियों को दंडवत प्रणाम किया और अपने दोनों हाथ जोड़कर उनके समक्ष अत्यंत विनयपूर्वक खड़े हो गए ।
तपस्वी ऋषियों ने राजा सुकेतुमान के इस शिष्ट, नम्र और विनयपूर्ण व्यवहार को देखकर अत्यंत प्रसन्नता व्यक्त की । मुनियों ने राजा से कहा, "हे राजन्! हम तुम्हारे इस धर्ममय आचरण और विनम्रता से अत्यंत प्रसन्न हैं। तुम अपनी इच्छा कहो, तुम्हारी क्या कामना है?" ।
राजा सुकेतुमान ने अत्यंत विनम्रतापूर्वक पूछा, "हे महाराज! आप लोग कौन हैं? और किसलिए यहाँ इस निर्जन वन में इस सरोवर के तट पर एकत्रित हुए हैं? कृपा करके मुझे अपना परिचय दीजिए।" ।
मुनियों ने राजा के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा, "हे राजन्! हम दस 'विश्वेदेव' (विश्वेदेवगण) हैं और यहाँ इस पवित्र सरोवर में स्नान करने के लिए आए हैं । आज 'पुत्रदा एकादशी' है। आज से ठीक पाँचवें दिन माघ मास का पवित्र स्नान आरंभ हो जाएगा । आज की यह एकादशी संतान देने वाली है। जो भी मनुष्य आज के दिन इस पुत्रदा एकादशी का उपवास रखता है, उसे निश्चय ही पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।" ।
यह सुनकर राजा को मानो अपने जीवन का लक्ष्य मिल गया। उन्होंने अपना परिचय और अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा, "हे विश्वेदेवगण! मैं भद्रावती नगरी का राजा सुकेतुमान हूँ । मेरा राज्य हर प्रकार के ऐश्वर्य से पूर्ण है, परंतु मेरे घर में कोई संतान नहीं है, जिसके कारण मैं और मेरे पितर अत्यंत दुखी हैं । मैंने संतान प्राप्ति हेतु सभी यत्न किए परंतु विफल रहा। यदि आप लोग मुझ पर वास्तव में प्रसन्न हैं, तो कृपा करके मुझे एक उत्तम पुत्र की प्राप्ति का वरदान दीजिए।" ।
पुत्रदा एकादशी व्रत का उपदेश
राजा सुकेतुमान की यह व्यथा और उनके दुःख का वास्तविक कारण जानकर विश्वेदेव मुनियों ने उन्हें सांत्वना दी और कहा, "हे राजन्! आज पौष मास के शुक्ल पक्ष की 'पुत्रदा' नाम की एकादशी है । त्रिलोक में इस एकादशी का व्रत बहुत विख्यात और अमोघ फलदायी है । तुम आज ही पूर्ण निष्ठा के साथ इस उत्तम व्रत का पालन करो । भगवान श्री केशव (श्रीहरि नारायण) के असीम प्रसाद और इस व्रत के महान पुण्य प्रभाव से तुम्हें अवश्य ही योग्य पुत्र की प्राप्ति होगी।" ।
मुनियों के इन मंगलकारी और आशा से भरे वचनों को सुनकर राजा सुकेतुमान का हृदय अत्यंत प्रसन्न हो गया, मानों पल भर में ही उनके जीवन के समस्त दुःखों और अंधकार का अंत हो गया हो । उनके मन में भगवान विष्णु के प्रति अपार श्रद्धा उत्पन्न हो गई。
श्रद्धापूर्वक व्रत-पालन और पारण
विश्वेदेव मुनियों के आदेशानुसार राजा सुकेतुमान ने उसी दिन सरोवर के तट पर पूर्ण श्रद्धा, निष्ठा और विधि-विधान के साथ भगवान श्री नारायण की पूजा की और पौष शुक्ल पुत्रदा एकादशी का उपवास रखा । उन्होंने ऋषियों द्वारा बताए गए एकादशी व्रत के सभी नियमों का कड़ाई से पालन किया। दिन भर निराहार रहकर उन्होंने भगवान विष्णु का ध्यान किया और रात्रि में भी भगवान का स्मरण करते हुए जागरण किया ।
अगले दिन, अर्थात् द्वादशी तिथि के शुभ अवसर पर, राजा ने प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर पुनः भगवान विष्णु का विधिपूर्वक पूजन किया । इसके पश्चात उन्होंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों और आश्रम के मुनियों को अन्न, वस्त्र तथा धन का दान दिया। मुनियों को दान-दक्षिणा देकर संतुष्ट करने के पश्चात, शुभ मुहूर्त में राजा ने अपने व्रत का पारण किया और अपना उपवास पूर्ण किया । व्रत पूर्ण करने के पश्चात राजा सुकेतुमान ने सभी मुनियों को साष्टांग प्रणाम किया, उनका पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त किया और अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर अपने राज्य भद्रावती के महल में वापस लौट आए ।
रानी द्वारा व्रत-फल की प्राप्ति, पुत्र-प्राप्ति और राज्य में आनंद
महल में वापस लौटने के पश्चात राजा सुकेतुमान ने अपनी महारानी शैव्या को वन का संपूर्ण वृत्तांत, विश्वेदेव मुनियों से हुई भेंट और उनके द्वारा बताए गए पुत्रदा एकादशी व्रत के महात्म्य के विषय में विस्तार से बताया। राजा और रानी दोनों ने भगवान श्रीहरि पर पूर्ण आस्था रखी। मुनियों के अमूल्य आशीर्वाद और पौष शुक्ल पुत्रदा एकादशी व्रत के अमोघ पुण्य प्रताप से, कुछ ही समय बीतने के बाद महारानी शैव्या ने गर्भ धारण किया ।
नौ महीने का समय पूर्ण होने के पश्चात, शुभ ग्रहों और उत्तम नक्षत्रों के योग में रानी शैव्या ने एक अत्यंत सुंदर, शूरवीर और तेजस्वी बालक को जन्म दिया । उस राजकुमार के जन्म का शुभ समाचार सुनते ही संपूर्ण भद्रावती नगरी में आनंद की लहर दौड़ गई, मानो राज्य में उत्सव छा गया हो । राजा सुकेतुमान, महारानी शैव्या और राज्य की संपूर्ण प्रजा भगवान विष्णु की कृपा से ऐसे तेजस्वी पुत्र को पाकर अत्यंत धन्य और प्रसन्न हो गए । राजा के पितरों को भी जब यह ज्ञात हुआ कि उनके वंश को आगे बढ़ाने वाला और उन्हें तर्पण देने वाला पुत्र उत्पन्न हो गया है, तो वे भी परम शांति और तृप्ति को प्राप्त हुए。
समय के साथ वह राजकुमार बड़ा हुआ। वह अत्यंत शूरवीर, यशस्वी, और उत्तम प्रजापालक राजा बना । उसने अपने श्रेष्ठ गुणों और धर्मपूर्ण आचरण से अपने पिता को पूर्ण संतोष प्रदान किया और धर्मपूर्वक शासन करते हुए अपने पितरों का विधिपूर्वक तर्पण कर उन्हें स्वर्ग में तृप्त किया । इस प्रकार पौष शुक्ल पुत्रदा एकादशी के व्रत के प्रभाव से राजा सुकेतुमान के इस लोक और परलोक, दोनों सुधर गए और उनके जीवन का सबसे बड़ा दुःख सदा के लिए समाप्त हो गया。
पारंपरिक फल-श्रुति (फल-वचन)
राजा सुकेतुमान की यह अद्भुत, पावन और कल्याणकारी कथा पूर्ण करने के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा, "हे राजन्! हे युधिष्ठिर! इसलिए जिस किसी भी मनुष्य को संतान सुख की लालसा हो, या जो भी अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण करना चाहता हो, उसे पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ पौष मास के शुक्ल पक्ष की इस 'पुत्रदा एकादशी' का व्रत अवश्य ही करना चाहिए ।
इस चराचर जगत में जो भी मनुष्य आस्थापूर्वक इस 'पुत्रदा एकादशी' का व्रत करता है, भगवान विष्णु की कृपा से उसे इस भौतिक जगत में अवश्य ही योग्य और गुणवान संतान (पुत्र) की प्राप्ति होती है । और जीवन के अंत में वह मनुष्य समस्त सांसारिक सुखों को भोगकर वैकुंठ धाम (स्वर्ग लोक) और मोक्ष को प्राप्त करता है ।
हे धर्मराज! जो मनुष्य इस पुत्रदा एकादशी के महात्म्य को, और इस परम पवित्र व्रत-कथा को श्रद्धापूर्वक पढ़ता है, सुनता है, अथवा दूसरों को सुनाता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे 'अश्वमेध यज्ञ' तथा 'अग्निष्टोम यज्ञ' करने के समान महान पुण्य फल की प्राप्ति होती है । हे युधिष्ठिर! यह संपूर्ण वृत्तांत और इस पवित्र एकादशी का यह विधान मैंने संपूर्ण मानव जाति के कल्याण और उद्धार के लिए तुमसे कहा है।"