श्रावण शुक्ल पुत्रदा एकादशी: भविष्य पुराण आधारित संपूर्ण पारंपरिक व्रत कथा
१. कथा का पारंपरिक प्रारंभ
युधिष्ठिर द्वारा प्रश्न
सनातन धर्म के पारंपरिक व्रत-विधानों और पौराणिक ग्रंथों में एकादशी तिथि को सर्वोपरि और परम कल्याणकारी माना गया है। भविष्य पुराण के उत्तर पर्व में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का अत्यंत विस्तृत, गूढ़ और परम पावन माहात्म्य प्राप्त होता है। इस पवित्र व्रत कथा का आरंभ नैमिषारण्य के पुनीत क्षेत्र अथवा साक्षात धर्मराज युधिष्ठिर और परम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के मध्य होने वाले उस दिव्य और अलौकिक संवाद से होता है, जो युगांतरों से पारंपरिक एकादशी-व्रत कथा पाठ का अभिन्न अंग रहा है ।
परम धर्मज्ञ, सत्यनिष्ठ और पाण्डवों के अग्रज धर्मराज युधिष्ठिर ने अत्यंत विनम्रता, श्रद्धा और भक्तिभाव से अपने दोनों हाथ जोड़कर परमपिता परमात्मा, यदुकुल नंदन भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमलों में प्रणाम किया और अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हुए यह प्रश्न किया:
श्री युधिष्ठिर महाराज उवाच: "हे मधुसूदन! हे मधु नामक भयंकर दैत्य का संहार करने वाले अच्युत! हे कमलनयन! आप मुझ पर अपनी अहैतुकी कृपा-दृष्टि बनाए रखें और मुझ पर दया करें। मैं आपसे श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) के शुक्ल पक्ष में आने वाली परम पवित्र एकादशी के विषय में श्रवण करने की अभिलाषा रखता हूँ। हे प्रभु! कृपया मुझे यह बताने की कृपा करें कि श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका क्या नाम है? उस दिन किस देवता की पूजा की जाती है? उस व्रत का पालन करने से किस फल की प्राप्ति होती है और उस दिन पारंपरिक रूप से किस कथा का श्रवण किया जाता है? हे माधव, मैं इस व्रत की पूर्ण और प्रामाणिक कथा को विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ, कृपया मेरा मार्गदर्शन करें" ।
श्रीकृष्ण द्वारा श्रावण शुक्ल पुत्रदा एकादशी का माहात्म्य-वर्णन
धर्मराज युधिष्ठिर के इन धर्मयुक्त, लोक-कल्याणकारी और विनीत वचनों को सुनकर परमेश्वर श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न हुए। उनके मुखमंडल पर एक अलौकिक मुस्कान छा गई और वे बोले:
श्री भगवान उवाच: "हे राजन! हे कुंतीनंदन युधिष्ठिर! तुमने संपूर्ण मानव जाति के कल्याण और सनातन धर्म की स्थापना के लिए अत्यंत उत्तम और श्रेष्ठ प्रश्न किया है। मैं तुम्हें इस परम पवित्र एकादशी की महिमा और इसकी पौराणिक कथा अत्यंत प्रसन्नता के साथ विस्तारपूर्वक सुनाता हूँ, एकाग्रचित्त होकर श्रवण करो। इस पवित्र एकादशी के विषय में केवल सुनने मात्र से ही मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ के समान महान पुण्य फल की प्राप्ति होती है और उसके समस्त संचित पाप भस्म हो जाते हैं" ।
भगवान श्रीकृष्ण ने आगे कहा: "हे युधिष्ठिर! श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली इस पावन और मंगलमयी एकादशी को संपूर्ण लोकों में 'पुत्रदा एकादशी' तथा 'पवित्रोपना एकादशी' (अथवा पवित्रा एकादशी) के नाम से जाना जाता है । इस एकादशी के अधिष्ठाता देव स्वयं श्रीहरि विष्णु हैं और भविष्य पुराण के अनुसार इस दिन विश्वेदेवों की भी पूजा का विधान है ।
हे राजन, यह एकादशी मुख्य रूप से उन गृहस्थों और दंपत्तियों के लिए संजीवनी और कल्पवृक्ष के समान है, जो लंबे समय से संतान सुख से वंचित हैं। संसार में 'पुत्र' की महत्ता और उसकी आध्यात्मिक व्युत्पत्ति अत्यंत गूढ़ है। संस्कृत भाषा में 'पुत्र' शब्द दो अक्षरों से मिलकर बना है—'पु' और 'त्र'। शास्त्रों के अनुसार 'पु' एक विशिष्ट और भयंकर नरक का नाम है, और 'त्र' का अर्थ है 'त्राण करना' या 'मुक्ति दिलाना'। इस प्रकार 'पुत्र' शब्द का शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ है—'वह व्यक्ति जो अपने माता-पिता और पूर्वजों को 'पु' नामक नरक की घोर यातनाओं से त्राण दिलाकर उन्हें मुक्ति प्रदान करता है' ।
इसी कारण से यह माना जाता है कि जिस विवाहित गृहस्थ पुरुष का कोई पुत्र नहीं होता, उसे इस भौतिक जीवन में और मृत्यु के पश्चात अगले जीवन में कोई सुख और शांति प्राप्त नहीं होती। प्रत्येक गृहस्थ को कम से कम एक पुत्र उत्पन्न करना चाहिए और उसे धर्म का उचित प्रशिक्षण देना चाहिए, तभी पिता को जीवन की नारकीय स्थिति से मुक्ति मिलती है ।
किंतु हे राजन, यह नियम भगवान विष्णु या मेरे (श्रीकृष्ण के) अनन्य और गंभीर भक्तों पर कठोरता से लागू नहीं होता। क्योंकि जो पूर्ण रूप से मेरे शरणागत हैं, उनके लिए भगवान स्वयं ही उनके पुत्र, पिता और माता बन जाते हैं। विद्वान चाणक्य पंडित ने भी इस सत्य को इस प्रकार उद्घाटित किया है:
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा।
शान्तिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः॥
अर्थात, सत्य मेरी माता है, ज्ञान मेरा पिता है, मेरा धर्म (कर्तव्य) मेरा भाई है, दया मेरी मित्र है, शांति मेरी पत्नी है, और क्षमा ही मेरा पुत्र है। ये छह ही मेरे वास्तविक परिवार के सदस्य हैं । भगवान के भक्त के छब्बीस प्रमुख गुणों में 'क्षमा' सर्वोपरि है। इसलिए एक भक्त 'क्षमा' रूपी पुत्र की प्राप्ति के लिए भी इस एकादशी का व्रत कर सकता है।
तथापि, भौतिक और सांसारिक जीवन में एक सुयोग्य और धर्मपरायण भौतिक पुत्र की प्राप्ति हेतु यह श्रावण शुक्ल पुत्रदा एकादशी अमोघ है। द्वापर युग के उदय काल में एक महान और धर्मात्मा राजा ने इसी पुत्रदा एकादशी के प्रभाव से सर्वगुण संपन्न पुत्र की प्राप्ति की थी। हे युधिष्ठिर, अब तुम उस राजा की संपूर्ण पारंपरिक कथा का श्रवण करो।"
श्रीकृष्ण द्वारा वर्णित 'पुत्र' की शास्त्रीय व्याख्या
| विवरण | 'पु' शब्द का अर्थ | 'त्र' शब्द का अर्थ | संपूर्ण अर्थ (पुत्र) | भक्तों के लिए आध्यात्मिक पुत्र |
|---|---|---|---|---|
| शास्त्रीय अर्थ | एक विशिष्ट प्रकार का भयंकर नरक जहाँ निःसंतान पितर जाते हैं । | त्राण करना, उद्धार करना अथवा मुक्ति दिलाना । | वह जो अपने माता-पिता को 'पु' नामक नरक से मुक्ति दिलाता है । | चाणक्य नीति के अनुसार 'क्षमा' ही भक्त का वास्तविक पुत्र है । |
२. मुख्य कथा (प्रथम प्रमुख संस्करण: भविष्य पुराण आधारित पारंपरिक गौ-अपराध वृत्तांत)
(कथा के पारंपरिक पाठ में यदि भविष्य पुराण का मूल गौ-अपराध वाला वृत्तांत पढ़ा जाता है, तो उसका अक्षुण्ण और विस्तारपूर्वक स्वरूप इस प्रकार है)
महिष्मती नगरी का वर्णन और राजा महिजित का परिचय
श्रीकृष्ण ने कथा का विस्तार करते हुए कहा— "हे युधिष्ठिर! द्वापर युग के आरंभिक काल में, महिष्मती (माहिष्मती पुरी) नाम की एक अत्यंत समृद्ध, विशाल और वैभवशाली नगरी हुआ करती थी। उस पावन नगरी पर राजा महिजित (जिन्हें महीजित अथवा महाजित भी कहा जाता है) शासन करते थे ।
राजा महिजित अत्यंत पराक्रमी, शूरवीर, धर्मपरायण, दयालु और न्यायप्रिय शासक थे। उनके राज्य में कोई भी दुखी, दरिद्र, रोगी या धर्म-विमुख नहीं था। राजा अपनी प्रजा का पालन-पोषण अपनी स्वयं की और सगी संतान की भाँति अत्यंत स्नेहपूर्वक करते थे। उनका राजकोष धन-धान्य से परिपूर्ण था और उनकी सैन्य शक्ति अत्यंत विशाल थी। संपूर्ण राज्य में सुख, शांति और धर्म का निर्बाध शासन था ।
संतानहीनता का दुःख और राजा का विलाप
यद्यपि राजा महिजित के पास विशाल साम्राज्य, अतुलनीय धन-संपदा, शक्तिशाली सेना, आज्ञाकारी मंत्री और अत्यंत रूपवान तथा गुणवान रानी थी, किंतु उनके जीवन में एक गहरा, शूल के समान चुभने वाला और पीड़ादायक अंधकार था—राजा पूर्णतः संतानहीन थे ।
कई वर्ष बीत जाने पर और अपनी आयु को निरंतर ढलते तथा बुढ़ापे को समीप आते देखकर राजा महिजित का मन अत्यंत शोकाकुल और चिंतित रहने लगा। उन्हें अपना वह विशाल साम्राज्य, भव्य राजमहल और अपार ऐश्वर्य पूर्णतः नीरस, शून्य और अंधकारमय प्रतीत होने लगे । उन्हें रात-दिन केवल यही चिंता सताने लगी कि उनके पश्चात इस विशाल साम्राज्य का उत्तराधिकारी कौन होगा? उनके राजवंश की कीर्ति को आगे कौन बढ़ाएगा? और सबसे महत्वपूर्ण, मृत्यु के पश्चात उन्हें और उनके पितरों को विधि-विधान से पिण्डदान और तर्पण कौन करेगा? ।
राजा ने संतान प्राप्ति की तीव्र अभिलाषा से अनेक प्रकार के यज्ञ, अनुष्ठान, दान, पुण्य, व्रत और कठोर तपस्याएँ कीं। उन्होंने राज्य के सभी सिद्ध पुरोहितों से उपाय करवाए, किंतु विधाता का लेख नहीं बदला और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति नहीं हो सकी ।
राज्य-सभा में ब्राह्मणों और प्रजा से परामर्श
जब राजा का दुःख और निराशा सहन करने की सभी सीमाएँ पार कर गई, तो एक दिन उन्होंने अपनी राज-सभा में राज्य के सभी प्रमुख विद्वानों, ब्राह्मणों, मंत्रियों, सलाहकारों और प्रजा के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया。
भारी मन, काँपते स्वर और अश्रुपूरित नेत्रों से धर्मात्मा राजा महिजित ने सभा को संबोधित करते हुए अपने हृदय की व्यथा को इन शब्दों में प्रकट किया:
राजा महिजित उवाच: "हे मेरे प्रिय प्रजाजनों, विद्वान ब्राह्मणों, द्विजों और मंत्रियों! आप सभी साक्षी हैं कि मैंने अपने इस वर्तमान जीवन में कभी कोई ज्ञात पाप कर्म नहीं किया है। मेरे राजकोष में कोई भी अन्यायपूर्ण या अनीति से कमाया हुआ धन नहीं है। मैंने कभी देवताओं और ब्राह्मणों को दिए गए चढ़ावे को नहीं हड़पा है और न ही उनके अधिकारों का हनन किया है ।
जब भी मैंने युद्ध किया और अन्य राज्यों पर विजय प्राप्त की, तो मैंने सदैव सैन्य कला के धर्म-नियमों का कठोरता से पालन किया है। मैंने अपनी प्रजा की रक्षा इस प्रकार की है जैसे वे मेरी अपनी ही संतान हों। न्याय करते समय मैंने कभी पक्षपात नहीं किया; यदि मेरे अपने सगे संबंधियों ने भी राज्य के कानून को तोड़ा, तो मैंने उन्हें भी बिना संकोच दंडित किया है। इसके विपरीत, यदि मेरा शत्रु भी विनम्र और धार्मिक प्रवृत्ति का था, तो मैंने उसका सत्कार किया है और उसे क्षमादान दिया है ।
हे द्विज श्रेष्ठों! यद्यपि मैं वैदिक मानदंडों का अत्यंत धार्मिक और निष्ठावान अनुयायी हूँ, फिर भी मेरा घर पुत्र के अभाव में सूना है। मेरा जीवन नीरस हो चुका है। हे ज्ञानीजनों, कृपया मेरे इस असीम दुःख का कारण खोजें और मुझे कोई ऐसा मार्ग बताएँ कि मुझे इस कष्ट से मुक्ति मिल सके" ।
| राजा महिजित के राज-धर्म के प्रमुख तत्व (स्वयं राजा द्वारा वर्णित) | |
|---|---|
| १. | राजकोष में कोई भी अन्यायपूर्ण या अधर्म का धन नहीं था । |
| २. | देवताओं और ब्राह्मणों के धन का कभी अपहरण नहीं किया गया । |
| ३. | युद्ध में केवल धर्म-युद्ध के नियमों का पालन किया गया । |
| ४. | प्रजा का संरक्षण अपनी स्वयं की संतान की भाँति किया गया । |
| ५. | न्याय में निष्पक्षता (अपराधी संबंधियों को दंड और विनम्र शत्रुओं का सम्मान) । |
ऋषि लोमश से मार्गदर्शन हेतु वन-गमन
राजा की इस करुण पुकार, सत्यनिष्ठा और व्यथा को सुनकर सभा में उपस्थित सभी ब्राह्मण, मंत्री और प्रजाजन अत्यंत द्रवित और दुखी हुए। उन्होंने आपस में गहन विचार-विमर्श किया और यह निश्चय किया कि वे राजा के इस अज्ञात पाप या कर्म-दोष का कारण जानने और उसका निवारण ढूँढने के लिए वन में तपस्यारत त्रिकालदर्शी ऋषियों की शरण में जाएँगे ।
राजा के परम कल्याण और राज्य के उत्तराधिकारी की खोज में प्रजा के प्रतिनिधि, मंत्री और विद्वान ब्राह्मण घने और बीहड़ वन की ओर प्रस्थान कर गए । वन में भटकते हुए उन्होंने कई महान तपस्वियों और ऋषियों के आश्रमों का दर्शन किया, किंतु वे किसी ऐसे परम ज्ञानी संत की खोज में थे जो राजा के इस अदृश्य कर्म-बंधन को देख सके。
अनेक वनों को पार करते हुए अंततः वे एक अत्यंत शांत, दिव्य और पवित्र आश्रम में पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक अत्यंत वयोवृद्ध, तेजस्वी और महान तपस्वी को देखा। वे ऋषि तपस्या की प्रतिमूर्ति, क्रोध को जीतने वाले (जितक्रोध), इंद्रियों को पूर्णतः वश में रखने वाले (जितेन्द्रिय), निराहार, सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों के ज्ञाता और पूर्णतः आत्मसंतुष्ट थे ।
वे महान ऋषि कोई और नहीं, बल्कि साक्षात 'लोमश ऋषि' थे。
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को उन मुनि की अलौकिक महिमा बताते हुए कहा, "हे युधिष्ठिर! महर्षि लोमश वेदों के समस्त निष्कर्षों में पारंगत विद्वान थे। उन्होंने अपनी आयु को स्वयं भगवान ब्रह्मा के समान बढ़ा लिया था। उनका संपूर्ण शरीर रोमों (बालों) से ढका हुआ था। उनका नाम 'लोमश' इसलिए पड़ा क्योंकि जब भी ब्रह्मा जी का एक कल्प (अर्थात 4 अरब 32 करोड़ वर्ष या ब्रह्मा जी के 12 घंटे) पूर्ण होता था, तब महर्षि लोमश के शरीर से केवल एक रोम (बाल) गिरता था। वे त्रिकालदर्शी थे—अर्थात भूत, वर्तमान और भविष्य के ज्ञाता थे" ।
प्रजा के प्रतिनिधियों ने परम ज्ञानी महर्षि लोमश को देखते ही बड़ी प्रसन्नता से साष्टांग दंडवत प्रणाम किया और अत्यंत विनम्रतापूर्वक उनके सम्मुख हाथ जोड़कर खड़े हो गए ।
उन सबको अपने आश्रम में इस प्रकार विनीत भाव से खड़ा देखकर त्रिकालदर्शी लोमश ऋषि ने अत्यंत मधुर और करुणा भरी वाणी में पूछा:
महर्षि लोमश उवाच: "हे सज्जनों! कृपया मुझे यह बताएँ कि आप सभी किस कारण से इस एकांत वन में मेरे आश्रम में आए हैं? आप मेरी इतनी स्तुति क्यों कर रहे हैं? आप निसंकोच होकर अपनी समस्या और आगमन का उद्देश्य कहें। मुझ जैसे तपस्वियों का जन्म केवल दूसरों के उपकार और जनकल्याण के लिए ही होता है। आप जो भी अपेक्षा लेकर आए हैं, मैं आपकी समस्याओं को हल करने के लिए वह सब कुछ करूँगा जो मेरे सामर्थ्य में है, इसमें लेशमात्र भी संदेह न करें" ।
महर्षि लोमश के ये अभयदान देने वाले वचन सुनकर प्रजाजनों और मंत्रियों ने गदगद कंठ से कहा:
प्रजा-प्रतिनिधि उवाच: "हे महर्षे! हे ब्रह्मा के समान तेजस्वी और दीर्घायु ऋषि! आप हमारे संशय और दुःख को दूर करने में पूर्णतः समर्थ हैं। हमारे माहिष्मती पुरी के राजा महिजित अत्यंत धर्मात्मा हैं। उन्होंने हम प्रजाजनों का अपनी सगी संतान से भी अधिक स्नेहपूर्वक पालन-पोषण किया है और हमारी रक्षा की है ।
किंतु हे मुनिश्रेष्ठ! ऐसा धर्मपरायण और प्रजापालक राजा आज पुत्रहीन होने के कारण अत्यंत घोर दुःख में डूबा हुआ है। राजा के इस संताप को देखकर हम सभी प्रजाजन भी अत्यंत दुखी और व्याकुल हो गए हैं । राजा के इस वर्तमान जन्म में तो कोई भी पाप दृष्टिगोचर नहीं होता, फिर उन्हें यह भयंकर दंड क्यों मिल रहा है? हे त्रिकालदर्शी मुनि, हम आपसे अत्यंत विनम्रतापूर्वक यह प्रार्थना करते हैं कि आप अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर हमें यह बताने की कृपा करें कि राजा महिजित के किस पूर्व-कर्म या पाप के कारण उन्हें यह संतानहीनता का घोर दुःख प्राप्त हुआ है और वह कौन सा अमोघ उपाय है जिससे हमारे दयालु राजा को एक पुत्र-रत्न की प्राप्ति हो सके?" ।
पूर्वजन्म के कर्म का कारण
प्रजाजनों की यह धर्मयुक्त, निस्वार्थ और राजा के प्रति निष्ठावान प्रार्थना सुनकर महर्षि लोमश ने अपने नेत्र बंद कर लिए और गहरे ध्यान (समाधि) में लीन हो गए । उन्होंने अपने अपार योगबल और दिव्य दृष्टि से राजा महिजित के पूर्वजन्मों के समस्त कर्म-बंधनों को स्पष्ट रूप से देख लिया。
कुछ समय पश्चात अपने नेत्र खोलकर, महर्षि लोमश ने प्रजाजनों से कहा:
"हे प्रजाजनों! ध्यानपूर्वक श्रवण करो। तुम्हारे राजा महिजित का वर्तमान जीवन यद्यपि पूर्णतः निष्पाप और धर्ममय है, किंतु उनका यह दुःख उनके ही पूर्वजन्म के एक विशिष्ट पाप कर्म का प्रत्यक्ष फल है。
पूर्वजन्म में तुम्हारे राजा एक अत्यंत निर्धन वैश्य (व्यापारी) थे । वह निर्धन वैश्य अपने व्यापार के सिलसिले में धन कमाने और जीविकोपार्जन हेतु एक गाँव से दूसरे गाँव भटका करता था। इसी भ्रमण के दौरान एक बार ज्येष्ठ मास का समय था। सूर्य अपनी चरम तपन पर था और चारों ओर भीषण गर्मी पड़ रही थी। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी से लेकर एकादशी का वह मध्यकाल था, जब वह वैश्य लगातार यात्रा करने के कारण दो दिनों से भूखा-प्यासा और अत्यंत थका हुआ था ।
दोपहर के समय चिलचिलाती धूप में, जब वह वैश्य प्यास से अत्यंत व्याकुल था, तब वह जल की खोज में एक जलाशय (बावड़ी/सरोवर) के तट पर पहुँचा। उसी समय, उस जलाशय पर एक अत्यंत प्यासी और ताप से पीड़ित गाय अपने नवजात बछड़े के साथ जल पीने के लिए आई। गाय और बछड़ा जलाशय में जाकर जल पी ही रहे थे कि प्यास और स्वार्थ से अंधे हो चुके उस वैश्य ने अत्यंत निर्दयतापूर्वक डंडे से हाँककर उस भूखी-प्यासी गौ माता और उसके बछड़े को जलाशय से दूर भगा दिया और स्वयं आगे बढ़कर अपनी प्यास बुझा ली" ।
महर्षि लोमश ने कर्म के सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए आगे कहा: "हे प्रजाजनों! एक प्यासी और दूध पिलाने वाली गौ माता तथा उसके शिशु को बलपूर्वक जल पीने से रोकना और उन्हें त्रस्त करना एक अत्यंत घोर और जघन्य पाप था । उसी भयंकर पाप कर्म के प्रभाव स्वरूप तुम्हारे राजा को इस जन्म में पुत्र-वियोग और संतानहीनता का यह घोर दुःख सहन करना पड़ रहा है。
किंतु, इसके विपरीत, उसी वैश्य ने अनजाने में ही सही, एकादशी के दिन भूखा-प्यासा रहकर जो कष्ट सहा और जीवन में जो कुछ अन्य पुण्य कर्म किए, उसके प्रभाव से उसे इस जन्म में माहिष्मती जैसे समृद्ध राज्य का निष्कंटक राज-सिंहासन प्राप्त हुआ है । कर्मों का विधान अत्यंत सूक्ष्म और अटल होता है; पुण्य के कारण उसे यह विशाल राज्य मिला, किंतु गौ-अपराध के पाप के कारण उसे पुत्र-शोक मिला।"
पुत्रदा एकादशी व्रत का उपदेश
महर्षि लोमश के मुख से राजा के पूर्वजन्म के पाप का यह रहस्य सुनकर सभी मंत्री और प्रजाजन स्तब्ध रह गए। उन्हें अत्यंत चिंता हुई। उन्होंने पुनः मुनि के चरणों में गिरकर अत्यंत करुण स्वर में प्रार्थना की:
"हे परम ज्ञानी महर्षे! शास्त्रों और वेदों में यह स्पष्ट उल्लेख है कि मनुष्य पुण्य अर्जित करके अपने अतीत के पापों के प्रभाव को निष्फल कर सकता है । आप वेदों के परम ज्ञाता हैं। आप हम पर कृपा करें और हमें कोई ऐसा महान पुण्य कर्म, व्रत या प्रायश्चित का उपदेश दें, जिसके अनुष्ठान से राजा महिजित के उस पाप का समूल नाश हो जाए और वे इस जन्म में एक तेजस्वी राजकुमार के पिता बन सकें" ।
प्रजा की इस धर्मनिष्ठा और अपने राजा के प्रति उनके अगाध प्रेम को देखकर महर्षि लोमश अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रजा को उस परम कल्याणकारी मार्ग का उपदेश देते हुए कहा:
"हे प्रजाजनों! मैं तुम्हें एक अत्यंत पवित्र और अमोघ व्रत का विधान बताता हूँ। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसे संपूर्ण लोकों में 'पुत्रदा एकादशी' अथवा 'पवित्रा/पवित्रोपना एकादशी' के नाम से जाना जाता है । यह एकादशी समस्त प्रकार के मनोवांछित फलों को प्रदान करने वाली, पापों को समूल नष्ट करने वाली और विशेष रूप से उत्तम संतान प्रदान करने वाली है。
तुम सब प्रजाजन, मंत्रीगण और स्वयं राजा महिजित तथा उनकी रानी को मिलकर पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ इस श्रावण शुक्ल पुत्रदा एकादशी का व्रत करना चाहिए। इस दिन समस्त नियमों और विधानों का कठोरता से पालन करते हुए पूर्ण निराहार रहें । भगवान श्रीहरि विष्णु (श्रीधर स्वरूप) की विधि-विधान से आराधना करें और संपूर्ण रात्रि भगवान के नामों का संकीर्तन करते हुए जागरण करें ।
इसके पश्चात, अगले दिन (द्वादशी तिथि को), तुम सभी नागरिक अपने द्वारा किए गए इस 'पुत्रदा एकादशी व्रत' का संपूर्ण पुण्य और फल अपने राजा महिजित को श्रद्धापूर्वक समर्पित कर देना । यदि तुम सब मेरी इस आज्ञा का निष्ठापूर्वक पालन करोगे, तो यह निश्चित है कि राजा का पूर्वजन्म का वह गौ-अपराध का पाप समूल नष्ट हो जाएगा और उन्हें अवश्य ही एक सर्वगुण संपन्न और तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी" ।
श्रद्धापूर्वक व्रत-पालन और रानी द्वारा व्रत-फल की प्राप्ति
महर्षि लोमश के इन अमृततुल्य और आशावान वचनों को सुनकर प्रजाजनों और मंत्रियों के मुखमंडल पर अपार हर्ष और प्रसन्नता छा गई। उन्होंने बारंबार महर्षि लोमश के चरणों में साष्टांग दंडवत प्रणाम किया, मुनि का धन्यवाद किया और अत्यंत उत्साह के साथ अपनी माहिष्मती नगरी की ओर लौट आए ।
राजधानी पहुँचकर उन्होंने राजा महिजित को महर्षि लोमश द्वारा बताए गए पूर्वजन्म के वृत्तांत और श्रावण शुक्ल पुत्रदा एकादशी व्रत के अमोघ उपदेश से विस्तारपूर्वक अवगत कराया। यह सुनकर राजा महिजित के हृदय को अत्यंत सांत्वना मिली और उन्होंने भगवान श्रीहरि के प्रति अपार श्रद्धा प्रकट की ।
कुछ ही समय पश्चात, जब श्रावण मास के शुक्ल पक्ष का आगमन हुआ और वह परम पवित्र और मंगलमयी 'पुत्रदा एकादशी' की पावन तिथि आई, तो संपूर्ण माहिष्मती नगरी में एक आध्यात्मिक उत्सव का वातावरण छा गया। राजा महिजित, उनकी रानी, मंत्रियों और राज्य की समस्त प्रजा ने महर्षि लोमश के निर्देशानुसार पूर्ण निष्ठा, भक्ति और विधि-विधान के साथ इस पवित्र व्रत का अनुष्ठान किया ।
सभी ने भगवान श्री गदाधर विष्णु (श्रीधर) का पंचामृत से अभिषेक कर पीले पुष्पों, तुलसी दल, धूप, दीप और नैवेद्य से उनकी भव्य पूजा की । संपूर्ण राज्य ने अन्न का त्याग कर पूर्ण निराहार व्रत रखा और रात्रि के समय श्रीहरि के मंगलमय भजनों और संकीर्तन के साथ पूर्ण रात्रि जागरण किया ।
अगले दिन, द्वादशी तिथि की निर्मल प्रभात बेला में, ब्राह्मणों को उत्तम दान-दक्षिणा, स्वर्ण, आभूषण, वस्त्र और भोजन प्रदान किया गया । इसके पश्चात, महर्षि लोमश की आज्ञानुसार, राज्य की समस्त प्रजा और मंत्रियों ने हाथ में जल लेकर अपने द्वारा किए गए पुत्रदा एकादशी व्रत का संपूर्ण पुण्य फल पूर्ण श्रद्धाभाव से राजा महिजित को अर्पित (दान) कर दिया ।
पुत्र-प्राप्ति और राज्य में आनंद
श्रीकृष्ण कथा को अपने अंतिम पड़ाव की ओर ले जाते हुए कहते हैं— "हे युधिष्ठिर! प्रजा द्वारा समर्पित उस सामूहिक और निर्मल पुण्य के अपूर्व प्रभाव से तथा भगवान श्रीहरि की अपार कृपा से राजा महिजित के पूर्वजन्म का वह घोर पाप तत्काल ही भस्म हो गया। देखते ही देखते, कुछ समय पश्चात रानी ने गर्भधारण किया ।
संपूर्ण राज्य में यह मंगल समाचार आग की भाँति फैल गया और सर्वत्र आनंद की लहर दौड़ गई। नौ मास का गर्भकाल पूर्ण होने के पश्चात, शुभ ग्रहों और नक्षत्रों की उत्तम बेला में, रानी ने एक अत्यंत सुंदर, स्वस्थ, बलवान और तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया ।
पुत्र जन्म का समाचार सुनते ही राजा महिजित का वर्षों का संताप पल भर में दूर हो गया। माहिष्मती नगरी में ऐसा अपार आनंदोत्सव मनाया गया मानो साक्षात स्वर्ग धरती पर उतर आया हो। वह राजकुमार बड़ा होकर अपने पिता के समान ही शूरवीर, अत्यंत प्रजापालक, न्यायप्रिय और सर्वगुण संपन्न चक्रवर्ती सम्राट बना । राजा महिजित ने अपने जीवन का शेष समय धर्म-कर्म और श्रीहरि की भक्ति में व्यतीत किया और अंत में उन्हें भगवान की कृपा से परम पद की प्राप्ति हुई।"
३. मुख्य कथा (द्वितीय प्रमुख संस्करण: मत्स्य-व्यापार एवं व्रत-भंग आधारित वृत्तांत)
(कथा-वाचन की परंपरा में, कुछ विशेष क्षेत्रों एवं ग्रंथों में राजा महिजित के पूर्वजन्म के पाप का एक भिन्न संस्करण भी प्रचलित है, जिसे प्रामाणिकता हेतु यहाँ पृथक रूप से प्रस्तुत किया जा रहा है। इस संस्करण में कथा का मूल ढाँचा समान है, केवल पूर्वजन्म का कारण भिन्न है) ।
इस संस्करण के अनुसार: प्राचीन काल में (कुछ स्थानों पर माहिष्मती के स्थान पर मथुरा का भी उल्लेख मिलता है) महिजित नाम के एक वीर, धर्मात्मा और दयालु राजा शासन करते थे। राजा ने अपनी प्रजा के कल्याण के लिए सब कुछ किया, किंतु उनके जीवन में एक गहरा दर्दनाक खालीपन था—उनकी कोई संतान नहीं थी। वर्षों तक यज्ञ, व्रत, तपस्या और दान करने के बावजूद जब उन्हें पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई, तो वे अत्यंत व्यथित हो गए ।
राजा ने ब्राह्मणों और ऋषियों से सलाह माँगी और एक दिन वे अपने कुल पुरोहितों के साथ महर्षि लोमश के आश्रम में पहुँचे। महर्षि ने राजा को ध्यानपूर्वक देखा और दिव्य दृष्टि के माध्यम से उनके पूर्व जीवन का रहस्य उजागर किया。
महर्षि लोमश ने कहा— "हे राजन! अपने पूर्व जन्म में तुम एक साधारण व्यापारी (वैश्य) थे और जल से मछली पकड़कर तथा उन्हें बेचकर अपनी आजीविका चलाते थे। दुर्भाग्यवश, श्रावण शुक्ल एकादशी के पवित्र दिन पर, तुमने एक बार फिर यही पाप कर्म (मछली पकड़ने और बेचने का कार्य) किया और उस दिन अन्न ग्रहण करके अपना उपवास (व्रत) भी तोड़ दिया। इसी भयंकर पाप और एकादशी के दिन व्रत-भंग के कारण, इस जन्म में तुम्हें संतान का सुख प्राप्त नहीं हुआ" ।
यह सुनकर राजा ने हाथ जोड़कर उपाय पूछा। तब महर्षि लोमश ने कहा: "यदि तुम विधिपूर्वक श्रावण शुक्ल एकादशी का व्रत करो, भगवान विष्णु की पूजा करो, उपवास रखो और रात्रि में जागरण करो, तो तुम्हारे पूर्वजन्म के सभी पाप नष्ट हो जाएँगे और तुम्हें एक तेजस्वी और गुणवान पुत्र की प्राप्ति होगी" ।
राजा ने महर्षि के निर्देशों का पालन किया। उन्होंने निष्ठापूर्वक पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा। अगली सुबह, द्वादशी को, उन्होंने ब्राह्मणों को दान दिया और भोजन कराया, और विधिपूर्वक अपना व्रत खोला। कुछ समय बाद, रानी ने एक सुंदर, कांतिमान और गुणवान पुत्र को जन्म दिया। पूरे राज्य में खुशी छा गई और तब से संतान प्राप्ति और वंश वृद्धि के लिए इस व्रत को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाने लगा ।
| कथा के प्रमुख संस्करणों में पूर्वजन्म के पाप का पाठांतर | |
|---|---|
| प्रथम संस्करण (भविष्य पुराण - सर्वाधिक प्रचलित) | वैश्य द्वारा प्यासी गाय और उसके बछड़े को डंडे से मारकर जल पीने से रोकना । |
| द्वितीय संस्करण (अन्य पारंपरिक पाठ) | वैश्य द्वारा एकादशी के दिन मछली पकड़ना, बेचना और अन्न खाकर व्रत भंग करना । |
| (यद्यपि ये दो भिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, किंतु दोनों ही कथाओं का मर्म, ऋषि लोमश का उपदेश और श्रावण शुक्ल पुत्रदा एकादशी के व्रत का फल पूर्णतः समान है।) | |
४. पारंपरिक उपसंहार एवं फलश्रुति
कथा को पूर्ण करते हुए, देवकीनंदन भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से अत्यंत गंभीर और प्रेमपूर्ण वचनों में एकादशी व्रत का महात्म्य बताते हुए कहा:
श्री भगवान उवाच: "हे युधिष्ठिर! हे पाण्डुनंदन! इस प्रकार राजा महिजित को श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की इस 'पुत्रदा एकादशी' के महान प्रभाव से उत्तम पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई और उनके जीवन का सबसे बड़ा दुर्भाग्य और दुःख सदा के लिए समाप्त हो गया । जो मनुष्य इस मृत्युलोक में संतान सुख की इच्छा रखते हैं, उनके लिए इस व्रत से बढ़कर संपूर्ण ब्रह्मांड में अन्य कोई उत्तम और सुलभ साधन नहीं है ।
हे राजन! जो भी मनुष्य पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की इस पुत्रदा एकादशी का व्रत करता है, उसे निश्चित रूप से सर्वगुण संपन्न, आयुष्मान और यशस्वी पुत्र की प्राप्ति होती है । जिन दंपत्तियों के घर संतान का अभाव है, उनके लिए यह व्रत साक्षात कल्पवृक्ष के समान है。
इतना ही नहीं, जो मनुष्य केवल भक्तिभाव से इस एकादशी व्रत की इस पारंपरिक कथा को पढ़ता है, अथवा किसी दूसरे के मुख से श्रवण करता है, अथवा दूसरों को सुनाता है—उसके इस जन्म और पूर्वजन्म के समस्त जाने-अनजाने किए गए पाप समूल नष्ट हो जाते हैं । इस कथा के श्रवण मात्र से ही उस मनुष्य को महान अग्निष्टोम यज्ञ, वाजपेय यज्ञ और अश्वमेध यज्ञ करने के समान अनंत पुण्य फल की प्राप्ति होती है ।
इस व्रत के प्रभाव से प्राणी इस मृत्युलोक (संसार) में समस्त प्रकार के भौतिक सुखों, धन-धान्य, ऐश्वर्य और उत्तम संतान का सुख भोगता है, और जीवन के अंत में वह परम पवित्र होकर श्रीहरि के दूतों द्वारा बैकुंठ धाम को ले जाया जाता है, जहाँ वह मोक्ष और परलोक में शाश्वत स्वर्ग की प्राप्ति करता है" ।
(यहाँ भविष्य पुराण में वर्णित श्रावण शुक्ल पक्ष की पुत्रदा अथवा पवित्रोपना एकादशी की यह संपूर्ण और पारंपरिक व्रत-कथा संपन्न होती है।)
(हरिः ॐ तत्सत, श्रीकृष्णार्पणमस्तु)