विस्तृत उत्तर
विश्वेदेव वे विशेष देवता हैं जो श्राद्ध में पितरों के साथ आहूत होते हैं और हवि को पितरों तक पहुँचाने में सहायक होते हैं। शास्त्रीय आधार के अनुसार महालय के इस द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों यानी पुरूरवा और आर्द्रव अथवा क्रतु और दक्ष की स्थापना अनिवार्य होती है।
विश्वेदेव शब्द का अर्थ देखें तो विश्व का अर्थ है सम्पूर्ण जगत्, और देव का अर्थ है देवता। विश्वेदेव यानी सम्पूर्ण जगत् के देवता। ये देवता विशेष रूप से पितृ-कर्म में आहूत होते हैं, और इनकी उपस्थिति श्राद्ध को सम्पूर्ण बनाती है।
विश्वेदेवों के दो जोड़े हैं। पहली जोड़ी पुरूरवा और आर्द्रव की है। पुरूरवा एक प्राचीन चन्द्रवंशी राजा थे, जो अत्यंत धर्मपरायण थे। उन्होंने अपने पितरों के लिए विधिपूर्वक श्राद्ध करके परम तृप्ति प्रदान की थी। आर्द्रव उनके सहचर देवता हैं। दूसरी जोड़ी क्रतु और दक्ष की है। क्रतु एक प्राचीन ऋषि थे, और दक्ष भी एक महान प्रजापति थे।
इन दोनों जोड़ियों में से किसी एक की स्थापना श्राद्ध में की जाती है। यह स्थानीय परम्परा और शास्त्रीय व्याख्या पर निर्भर करता है। दोनों ही जोड़ियाँ समान रूप से शास्त्र-सम्मत हैं।
विश्वेदेवों की स्थापना अनिवार्य है। महालय के द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों की स्थापना अनिवार्य होती है। यह केवल इच्छा या वैकल्पिक नहीं है, बल्कि शास्त्र-निर्धारित कर्तव्य है। पार्वण श्राद्ध की पूर्णता के लिए विश्वेदेवों का होना आवश्यक है।
विश्वेदेवों की भूमिका विशेष है। पहली भूमिका है पितरों के साथ आना। श्राद्ध के समय पितर अपने वंशजों के पास आते हैं, और विश्वेदेव उनके सहचर के रूप में साथ आते हैं। दूसरी भूमिका है हवि को पहुँचाना। विश्वेदेव श्राद्ध में अर्पित किए गए हवि को सूक्ष्म रूप में पितरों तक पहुँचाने में सहायक होते हैं। तीसरी भूमिका है श्राद्ध को सम्पूर्ण बनाना। बिना विश्वेदेवों के श्राद्ध सम्पूर्ण नहीं माना जाता।
विश्वेदेव और अधिष्ठाता देवता का अंतर है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.268 के अनुसार श्राद्ध के मूल अधिष्ठाता देवता वसु, रुद्र और आदित्य हैं। ये तीनों तीन पीढ़ियों के प्रतिनिधि हैं। विश्वेदेव अलग हैं - वे श्राद्ध के सहायक देवता हैं, जो पितरों के साथ आहूत होते हैं। दोनों ही श्राद्ध में अनिवार्य हैं, परंतु उनकी भूमिकाएँ अलग हैं।
पुरूरवा का सम्बन्ध श्राद्ध से विशेष है। विष्णु पुराण के अनुसार महाराज पुरुरवा एक चन्द्रवंशी सम्राट थे, जो अत्यंत धर्मपरायण और विष्णु भक्त थे। उन्होंने अपने पितरों की आकांक्षा को पूर्ण कर विधिपूर्वक श्राद्ध संपन्न कर उन्हें परम तृप्ति प्रदान की। परिणामस्वरूप, पितरों के आशीर्वाद से पुरुरवा ने अकूत ऐश्वर्य, धर्म और अंततः मोक्ष प्राप्त किया। इसलिए उन्हें विश्वेदेवों में स्थान मिला है।
विश्वेदेवों की स्थापना की विधि भी विशेष है। श्राद्ध की वेदी पर विश्वेदेवों के लिए अलग आसन और अर्पण की व्यवस्था होती है। उनके निमित्त भी हवि अर्पित की जाती है, और मन्त्रों से उनका आवाहन किया जाता है।
विश्वेदेवों का गहरा दार्शनिक अर्थ है। ये देवता दर्शाते हैं कि श्राद्ध एक सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय यज्ञ है। इसमें केवल पितर ही नहीं, बल्कि देवता भी शामिल हैं। विश्व के सब देवताओं की उपस्थिति से श्राद्ध सम्पूर्ण होता है।
पार्वण श्राद्ध में विश्वेदेव और एकोद्दिष्ट में नहीं, यह एक मुख्य अंतर है। एकोद्दिष्ट श्राद्ध में केवल एक पितर का आवाहन होता है, और विश्वेदेवों की अनिवार्य स्थापना नहीं होती। पार्वण श्राद्ध में तीन पीढ़ियों के साथ विश्वेदेव अनिवार्य रूप से स्थापित होते हैं। इसी से पार्वण की महिमा बढ़ती है।
विश्वेदेवों की प्रसन्नता का व्यापक प्रभाव है। जब विश्वेदेव प्रसन्न होते हैं, तो वे न केवल हवि को पितरों तक पहुँचाते हैं, बल्कि वंशज को भी विशेष आशीर्वाद देते हैं। श्राद्ध से जो आठ अमूल्य संपदाएँ - आयु, सन्तान, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, सुख, राज्य - मिलती हैं, उनमें विश्वेदेवों की भूमिका भी होती है।
विश्वेदेव और कलाप उपवन की कथा भी जुड़ी है। विष्णु पुराण के तृतीय अंश के अनुसार पूर्व काल में कलाप उपवन में पितृगण आपस में वार्तालाप कर रहे थे। उनकी आकांक्षा थी कि कोई धर्मपरायण वंशज उनके लिए विधिपूर्वक श्राद्ध करे। महाराज पुरुरवा ने इस आकांक्षा को पूरा किया, और इसी कारण विश्वेदेवों में पुरूरवा का स्थान है।
विश्वेदेवों का यम-द्वितीया से भी सम्बन्ध है। पद्म पुराण के अनुसार द्वितीया तिथि पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है। इस दिन विश्वेदेवों की स्थापना से यमराज भी प्रसन्न होते हैं, और पितरों को यमदूतों की यातना नहीं सहनी पड़ती। शास्त्रीय आधार के रूप में श्राद्ध-तत्त्व, धर्मसिन्धु, याज्ञवल्क्य स्मृति, विष्णु पुराण और पद्म पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः विश्वेदेव वे विशेष देवता हैं जो श्राद्ध में पितरों के साथ आहूत होते हैं और हवि को पितरों तक पहुँचाने में सहायक होते हैं। महालय के द्वितीया श्राद्ध में पुरूरवा-आर्द्रव या क्रतु-दक्ष की स्थापना अनिवार्य होती है। ये पार्वण श्राद्ध की पूर्णता के लिए आवश्यक हैं।
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