विस्तृत उत्तर
द्वितीया श्राद्ध में मुख्यतः तीन पीढ़ियों के पितरों और विश्वेदेवों का आवाहन होता है। शास्त्रीय आधार के अनुसार पार्वण श्राद्ध में एक साथ तीन पीढ़ियों यानी पिता, पितामह, प्रपितामह तथा माता पक्ष यानी मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह का सतीक यानी पत्नी सहित आवाहन किया जाता है। महालय के इस द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों यानी पुरूरवा और आर्द्रव अथवा क्रतु और दक्ष की स्थापना अनिवार्य होती है।
द्वितीया श्राद्ध में आवाहन की पाँच मुख्य कोटियाँ हैं। पहली कोटि है पितृ पक्ष की तीन पीढ़ियाँ। ये हैं पिता, पितामह यानी दादा, और प्रपितामह यानी परदादा। ये तीनों कर्ता के पिता-कुल के तीन पूर्व पीढ़ी हैं। दूसरी कोटि है मातृ पक्ष की तीन पीढ़ियाँ। ये हैं मातामह यानी नाना, प्रमातामह यानी परनाना, और वृद्धप्रमातामह यानी वृद्ध परनाना। ये तीनों कर्ता के माता-कुल के तीन पूर्व पीढ़ी हैं।
तीसरी कोटि है पत्नी सहित आवाहन। प्रत्येक पीढ़ी के पुरुष पितर का आवाहन उनकी पत्नी सहित किया जाता है। यानी पिता के साथ माता का, पितामह के साथ पितामही का, प्रपितामह के साथ प्रप्रपितामही का आवाहन होता है। इसी प्रकार मातामह के साथ मातामही, प्रमातामह के साथ प्रमातामही का आवाहन होता है। इसे सतीक आवाहन कहते हैं।
चौथी कोटि है विश्वेदेव। महालय के द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेव अनिवार्य रूप से स्थापित किए जाते हैं। विश्वेदेव दो जोड़ियों में आते हैं। पहली जोड़ी पुरूरवा और आर्द्रव की है। दूसरी जोड़ी क्रतु और दक्ष की है। ये देवता श्राद्ध में आहूत होते हैं, और उनके माध्यम से ही हवि पितरों तक पहुँचती है।
पाँचवीं कोटि है श्राद्ध के अधिष्ठाता देवता। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.268 के अनुसार श्राद्ध के मूल अधिष्ठाता देवता वसु, रुद्र और आदित्य हैं। जब कोई वंशज अपने पूर्वजों यानी पिता, पितामह, प्रपितामह के निमित्त श्राद्ध करता है, तो ये तीनों देवता क्रमशः उन तीन पीढ़ियों के प्रतिनिधि के रूप में उस हव्य-कव्य को ग्रहण करते हैं और उसे सूक्ष्म रूप में उन मृत पितरों तक पहुँचाते हैं।
वसु, रुद्र और आदित्य की भूमिका विशेष है। वसु पिता पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। रुद्र पितामह पीढ़ी का। आदित्य प्रपितामह पीढ़ी का। ये तीनों देवता श्राद्ध में आहूत हवि को ग्रहण करते हैं और पितरों तक पहुँचाते हैं। यह एक दिव्य सूक्ष्म प्रक्रिया है।
एकोद्दिष्ट और पार्वण में आवाहन का अंतर है। एकोद्दिष्ट श्राद्ध में केवल एक ही पितर का आवाहन होता है। यदि किसी की मृत्यु द्वितीया को हुई हो, तो प्रतिवर्ष उसी एक पितर का एकोद्दिष्ट श्राद्ध होता है, जिसमें केवल एक पिण्ड का दान होता है। पार्वण श्राद्ध में तीन पीढ़ियों का सामूहिक आवाहन होता है, और तीन पिण्ड बनाए जाते हैं।
पिण्डदान भी इसी आवाहन के अनुसार होता है। पार्वण श्राद्ध में तीन पिण्ड पिता, पितामह और प्रपितामह के लिए बनाए जाते हैं। एकोद्दिष्ट में एक पिण्ड उसी एक मृत व्यक्ति के लिए बनाया जाता है। आवाहन और पिण्डदान का सीधा सम्बन्ध है।
भगवान वराह की कथा भी इसी से जुड़ी है। महाभारत के शांतिपर्व और अन्य वैदिक संहिताओं के अनुसार पिण्डदान की पवित्र परम्परा स्वयं भगवान विष्णु के वराह अवतार द्वारा प्रारंभ की गई थी। उन्होंने तीन गोल पिण्डों का निर्माण किया और उन्हें कुशा के ऊपर दक्षिण दिशा की ओर स्थापित किया, और घोषित किया कि ये तीन पिण्ड क्रमशः पिता, पितामह और प्रपितामह के शाश्वत प्रतीक माने जाएं।
जीवात्माओं का सूक्ष्म आगमन भी विशेष है। जो जीवात्माएँ पितृलोक को प्राप्त हो चुकी हैं, वे महालय के समय अपने वंशजों के निकट सूक्ष्म रूप में आती हैं और अपने निमित्त किए जाने वाले पार्वण श्राद्ध की प्रतीक्षा करती हैं। यानी आवाहन के समय पितर सीधे आ जाते हैं, और श्राद्ध स्वीकार करते हैं।
आवाहन का मन्त्र-संस्कार भी विशेष है। श्राद्ध में पितरों के गोत्र और नाम का स्पष्ट उच्चारण किया जाता है। गोत्र और नाम के साथ ही पितर सूक्ष्म रूप में पहुँचते हैं और हवि स्वीकार करते हैं। यह वेदमन्त्रों की दिव्य शक्ति का परिणाम है। शास्त्रीय आधार के रूप में याज्ञवल्क्य स्मृति, श्राद्ध-तत्त्व, धर्मसिन्धु और महाभारत शांतिपर्व इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः द्वितीया श्राद्ध में पार्वण विधि से तीन पीढ़ियों यानी पिता, पितामह, प्रपितामह और मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह का सतीक आवाहन होता है। साथ ही विश्वेदेवों यानी पुरूरवा-आर्द्रव या क्रतु-दक्ष की स्थापना और वसु, रुद्र, आदित्य अधिष्ठाता देवताओं की उपस्थिति भी अनिवार्य है।
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