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पार्वण श्राद्ध से जुड़े सभी प्रश्न(18)

पार्वण श्राद्ध पर शास्त्रीय व्याख्या, विधि, नियम, मंत्र और लाभ — सब एक ही स्थान पर। कुल 18 प्रश्न उपलब्ध हैं।

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पार्वण श्राद्ध कब करें?

पार्वण श्राद्ध रौहिण और अपराह्न काल में करें।

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पार्वण श्राद्ध क्या होता है?

पितृ पक्ष की तिथि पर किया गया श्राद्ध पार्वण श्राद्ध है।

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पुरूरव-आर्द्रव कौन हैं?

पुरूरव-आर्द्रव पार्वण श्राद्ध के विश्वेदेव हैं।

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कुतप मुहूर्त क्या है?

कुतप मुहूर्त श्राद्ध का श्रेष्ठ मध्याह्न समय है।

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प्रतिपदा श्राद्ध की विधि क्या है?

प्रतिपदा श्राद्ध में तर्पण, पिण्डदान, पंचबलि और ब्राह्मण भोजन किया जाता है।

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पार्वण श्राद्ध क्या है?

पितृ पक्ष में तीन पीढ़ियों के लिए किया गया श्राद्ध पार्वण श्राद्ध है।

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मृत्यु तिथि श्राद्ध क्यों मुख्य है?

जिस तिथि को मृत्यु हुई हो, उसी तिथि का श्राद्ध मुख्य माना गया है।

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पार्वण श्राद्ध क्या है?

विशेष तिथि या पक्ष में किया गया श्राद्ध पार्वण श्राद्ध है।

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श्राद्ध विधि

विश्वेदेव की स्थापना क्यों जरूरी है?

विश्वेदेव की स्थापना पार्वण श्राद्ध में अनिवार्य है क्योंकि वे हवि को पितरों तक पहुँचाने में सहायक होते हैं और श्राद्ध को सम्पूर्ण बनाते हैं। शास्त्र-विधान के अनुसार महालय के द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों की स्थापना अनिवार्य है। बिना इनके श्राद्ध अधूरा रह जाता है, हवि सूक्ष्म रूप में पितरों तक नहीं पहुँचती, और पितरों को पूर्ण तृप्ति नहीं मिलती।

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श्राद्ध विधि

क्या मातृ पक्ष का भी आवाहन होता है?

हाँ, पार्वण श्राद्ध में मातृ पक्ष का भी सतीक आवाहन होता है। मातृ पक्ष से तीन पीढ़ियाँ - मातामह यानी नाना, प्रमातामह यानी परनाना, और वृद्धप्रमातामह यानी वृद्ध परनाना - सब अपनी पत्नियों यानी मातामही, प्रमातामही, वृद्धप्रमातामही के साथ आहूत होते हैं। यह पितृ पक्ष की तीन पीढ़ियों के साथ मिलकर कुल बारह पितरों का सामूहिक आवाहन बनाता है।

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श्राद्ध भेद

पार्वण श्राद्ध की क्या विशेषता है?

पार्वण श्राद्ध की मुख्य विशेषता तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन है। इसमें पिता, पितामह, प्रपितामह और मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह — सब अपनी पत्नियों के साथ आहूत होते हैं। साथ ही विश्वेदेवों यानी पुरूरवा-आर्द्रव या क्रतु-दक्ष की स्थापना अनिवार्य होती है। तीन पिण्ड बनते हैं, जो तीन पीढ़ियों के प्रतीक हैं। यह मुख्यतः पितृ पक्ष में होता है।

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श्राद्ध विधि

द्वितीया श्राद्ध में किसका आवाहन होता है?

द्वितीया श्राद्ध में पार्वण विधि से तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन होता है। पितृ पक्ष से पिता, पितामह, प्रपितामह और मातृ पक्ष से मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह — सब अपनी पत्नियों के साथ आहूत होते हैं। साथ ही विश्वेदेवों यानी पुरूरवा-आर्द्रव या क्रतु-दक्ष की स्थापना अनिवार्य है। श्राद्ध के अधिष्ठाता देवता वसु, रुद्र और आदित्य भी उपस्थित होते हैं।

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तिथि श्राद्ध

द्वितीया तिथि को मरे व्यक्ति का श्राद्ध कब होता है?

द्वितीया तिथि को स्वाभाविक रूप से मरे व्यक्ति का श्राद्ध भी द्वितीया तिथि को ही होता है। शुक्ल या कृष्ण दोनों पक्षों में मृत्यु पर समान नियम है। मृत्यु दिन में हुई हो या रात में, मृत्यु के समय जो तिथि थी, वही श्राद्ध तिथि मानी जाती है। परंतु अकाल मृत्यु पर चतुर्दशी, सधवा पर नवमी, और संन्यासी पर द्वादशी को श्राद्ध होगा।

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पितृ पक्ष

आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वितीया क्यों खास है?

आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वितीया खास है क्योंकि यह पितृ पक्ष यानी महालय का दूसरा दिन है। इस दिन पार्वण श्राद्ध से तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन होता है, और विश्वेदेव स्थापित होते हैं। स्कन्द पुराण के अनुसार इस दिन श्राद्ध करने से शिव प्रसन्न होते हैं और कैलास धाम मिलता है। याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार सुयोग्य दामाद और पशु-धन की प्राप्ति होती है।

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श्राद्ध के प्रकार

पार्वण श्राद्ध क्या है?

पार्वण श्राद्ध = पितृ पक्ष में किया जाने वाला श्राद्ध। 'पर्व' (विशेष काल) से नाम। तीन पीढ़ियों (पिता, पितामह, प्रपितामह) के पितरों का संयुक्त तर्पण और पिण्डदान। प्रतिपदा श्राद्ध भी इसी कोटि का।

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पार्वण श्राद्ध का अधिकार कब मिलता है?

सपिण्डीकरण के बाद आत्मा पितृ पद प्राप्त कर पार्वण श्राद्ध की अधिकारी बनती है।

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पार्वण श्राद्ध में विश्वेदेवों का आह्वान क्यों अनिवार्य है?

विश्वेदेव श्राद्ध के रक्षक और साक्षी हैं; वे पितृभाग को राक्षस-पिशाचों से सुरक्षित रखते हैं।

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विश्वेदेव कौन हैं?

विश्वेदेव पितृ-कर्म के रक्षक, साक्षी और मार्गदर्शक देव हैं।

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