विस्तृत उत्तर
आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वितीया विशेष रूप से इसलिए खास है क्योंकि यह पितृ पक्ष या महालय का दूसरा दिन है। शास्त्रीय आधार के अनुसार द्वितीया श्राद्ध का तात्पर्य उस श्राद्ध कर्म से है जो किसी भी मास की द्वितीया तिथि को, विशेषकर आश्विन मास के कृष्ण पक्ष यानी पितृ पक्ष या महालय की द्वितीया तिथि को सम्पन्न किया जाता है।
आश्विन कृष्ण द्वितीया की पाँच प्रमुख विशेषताएँ हैं। पहली विशेषता है इसका पितृ पक्ष से सम्बन्ध। पितृ पक्ष यानी महालय आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में आता है। इसमें पूर्णिमा से लेकर अमावस्या तक 16 दिन होते हैं। द्वितीया इस पक्ष का दूसरा दिन है, प्रतिपदा के बाद। दूसरी विशेषता है पार्वण श्राद्ध की अनिवार्यता। श्राद्ध-तत्त्व और धर्मसिन्धु के अनुसार महालय के 16 दिनों में किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण विधि से ही होना चाहिए, भले ही मृत्यु की तिथि कोई भी रही हो।
तीसरी विशेषता है तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन। पार्वण श्राद्ध में एक साथ तीन पीढ़ियों यानी पिता, पितामह, प्रपितामह तथा माता पक्ष यानी मातामह, प्रमातामह, वृद्धप्रमातामह का सतीक यानी पत्नी सहित आवाहन किया जाता है। इस दिन कुटुम्ब के सब पूर्वज एक साथ तृप्त होते हैं।
चौथी विशेषता है विश्वेदेवों की स्थापना। महालय के इस द्वितीया श्राद्ध में विश्वेदेवों यानी पुरूरवा और आर्द्रव अथवा क्रतु और दक्ष की स्थापना अनिवार्य होती है। विश्वेदेव वे देवता हैं जो श्राद्ध में पितरों के साथ आहूत होते हैं, और हवि उन्हीं के माध्यम से पितरों तक पहुँचता है।
पाँचवीं विशेषता है पितरों का सूक्ष्म आगमन। जो जीवात्माएँ पितृलोक को प्राप्त हो चुकी हैं, वे महालय के समय अपने वंशजों के निकट सूक्ष्म रूप में आती हैं और अपने निमित्त किए जाने वाले पार्वण श्राद्ध की प्रतीक्षा करती हैं। इसलिए आश्विन कृष्ण द्वितीया पर पितर सीधे अपने वंशजों के द्वार पर आते हैं।
इस तिथि का काम्य फल अद्वितीय है। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार जो व्यक्ति द्वितीया तिथि को काम्य भावना से पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध करता है, उसे कन्यावेदिन यानी अपनी कन्याओं के लिए अत्यंत सुयोग्य, श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ वर यानी दामाद की प्राप्ति होती है। साथ ही, द्वितीया को श्राद्ध करने वाले गृहस्थ को पशून् वै यानी उत्तम कोटि के पशु-धन यानी गौ, अश्व आदि की प्राप्ति होती है। यह विशेष फल इस तिथि को अद्वितीय बनाता है।
इस तिथि का स्कन्द पुराण से सम्बन्ध भी अत्यंत विशेष है। स्कन्द महापुराण के नागर खण्ड अध्याय 230 में महर्षि व्यास ने महालय यानी पितृ पक्ष की द्वितीया को श्राद्ध करने के सर्वोत्कृष्ट पारलौकिक फल का गान किया है। जो मनुष्य महालय की द्वितीया तिथि को पूर्ण भक्ति और श्रद्धा के साथ अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उससे भगवान भवानीपति महेश्वर यानी शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं। वह श्राद्धकर्ता मृत्यु के पश्चात् निश्चित रूप से कैलास धाम को प्राप्त करता है और भगवान शिव के गणों के साथ मोद यानी आनन्द प्राप्त करता है।
इस तिथि पर शिव की विशेष प्रसन्नता होती है। प्रसन्न होकर भगवान शिव श्राद्धकर्ता को इस लोक में भी विपुल सम्पदा यानी विपुलां सम्पदं प्रदान करते हैं। यह आश्विन कृष्ण द्वितीया का सर्वोच्च पारलौकिक फल है, जो इसे अत्यंत खास बनाता है।
इस तिथि पर श्राद्ध न करने का दण्ड भी विशेष है। स्कन्द पुराण के अनुसार जो मनुष्य द्वितीया तिथि को अधिकार होने पर भी महालय का श्राद्ध नहीं करता, भगवान शम्भु यानी शिव उस पर कुपित हो जाते हैं और उसके ब्रह्म-वर्चस्व यानी तेज और पुण्य का सर्वथा नाश कर देते हैं। इतना ही नहीं, मृत्यु के पश्चात् उसे रौरव और कालसूत्र नामक भयंकर नरकों की यातना भोगनी पड़ती है।
इस तिथि का यमराज से सम्बन्ध भी अद्वितीय है। पद्म पुराण के अनुसार धर्मशास्त्रों में द्वितीया तिथि मात्र पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है। प्राचीन काल में द्वितीया तिथि के दिन ही देवी यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर में आदरपूर्वक भोजन कराया था। इस सत्कार से प्रसन्न होकर यमराज ने द्वितीया तिथि को महान उत्सव घोषित किया। आश्विन कृष्ण द्वितीया पर इस यमराज प्रसन्नता का विशेष लाभ मिलता है। शास्त्रीय आधार के रूप में स्कन्द पुराण, याज्ञवल्क्य स्मृति, पद्म पुराण और श्राद्ध-तत्त्व इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः आश्विन कृष्ण पक्ष की द्वितीया विशेष रूप से इसलिए खास है क्योंकि यह पितृ पक्ष यानी महालय का दूसरा दिन है। इस दिन पार्वण श्राद्ध से तीन पीढ़ियों का सतीक आवाहन होता है, विश्वेदेवों की स्थापना अनिवार्य होती है, और श्राद्धकर्ता को कैलास प्राप्ति, सुयोग्य दामाद, पशु-धन तथा विपुल सम्पदा का अद्वितीय फल मिलता है।
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