विस्तृत उत्तर
सव्य और अपसव्य श्राद्ध विधि में जनेऊ की दो अलग-अलग अवस्थाएँ हैं। शास्त्रीय आधार के अनुसार श्राद्ध विधि में यज्ञोपवीत की स्थिति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। देव कार्य में जनेऊ बाएं कंधे पर सव्य अवस्था में रहता है, परंतु पितरों का तर्पण करते समय जनेऊ को दाएं कंधे पर और बाएं हाथ के नीचे रखा जाता है, और इस अवस्था को अपसव्य कहा जाता है।
दोनों की पूर्ण तुलना देखें तो सव्य में जनेऊ का स्थान बाएं कंधे पर होता है, इसका कार्य देव कार्य होता है, इसकी दिशा पूर्व या उत्तर होती है, इसका अवसर सामान्य पूजा, यज्ञ और शुभ कार्य होता है, और इसकी व्युत्पत्ति में सव्य का अर्थ बाएं ओर होता है। अपसव्य में जनेऊ का स्थान दाएं कंधे पर और बाएं हाथ के नीचे होता है, इसका कार्य पितृ कार्य होता है, इसकी दिशा दक्षिण होती है, इसका अवसर श्राद्ध, तर्पण और पिण्डदान होता है, और इसकी व्युत्पत्ति में अप विपरीत और सव्य बाएं से बना यह शब्द होता है, अर्थात् सव्य का उल्टा या दाएं ओर।
मुख्य अंतर चार बातों में हैं। पहला अंतर है कंधे का, क्योंकि सव्य में बायाँ कंधा होता है और अपसव्य में दायाँ कंधा होता है। दूसरा अंतर है कार्य का, क्योंकि सव्य देव कार्य के लिए है और अपसव्य पितृ कार्य के लिए है। तीसरा अंतर है दिशा का, क्योंकि सव्य के साथ पूर्व या उत्तर दिशा होती है, और अपसव्य के साथ दक्षिण दिशा होती है। चौथा अंतर है स्वरूप का, क्योंकि सव्य सामान्य अवस्था है और अपसव्य विशेष अवस्था है।
इन दो अवस्थाओं के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण है कार्य का स्वरूप, क्योंकि देव कार्य में ऊपर की ओर ऊर्जा देवलोक की ओर जाती है, और पितृ कार्य में नीचे की ओर ऊर्जा पितृलोक की ओर जाती है, इसलिए दोनों के लिए अलग-अलग चिह्न आवश्यक हैं। दूसरा कारण है ऊर्जा प्रवाह, क्योंकि सव्य सामान्य ऊर्जा प्रवाह को दर्शाता है, और अपसव्य विपरीत या उल्टा ऊर्जा प्रवाह अर्थात् पितृलोक की ओर को दर्शाता है। तीसरा कारण है शास्त्रीय भेद, क्योंकि सनातन धर्म में देव और पितर दो अलग-अलग कोटियाँ हैं, और दोनों के लिए स्पष्ट चिह्न आवश्यक हैं।
व्यावहारिक प्रदर्शन के अनुसार सव्य से अपसव्य कैसे जाएँ तो पहले जनेऊ बाएं कंधे पर है यानी सव्य अवस्था में, फिर इसे सिर के ऊपर से दाएं कंधे पर ले जाएँ, फिर बाएं हाथ के नीचे आने दें, अब यह अपसव्य अवस्था में आ गया है। अपसव्य से सव्य कैसे जाएँ तो श्राद्ध समाप्त होने पर जनेऊ को वापस बाएं कंधे पर ले आएँ, और सामान्य अवस्था अर्थात् सव्य में आ जाएँ। अत्यंत महत्त्वपूर्ण शब्द का अर्थ यह है कि शास्त्रों ने इस भेद को अत्यंत महत्त्वपूर्ण कहा है, और गलत अवस्था का अर्थ कार्य अधूरा है। शास्त्रीय स्रोत के रूप में आश्वलायन गृह्यसूत्र, गरुड़ पुराण और याज्ञवल्क्य स्मृति में श्राद्ध की सूक्ष्म विधि का विस्तार से वर्णन है। यह भेद सिद्ध करता है कि सनातन धर्म में देव कार्य और पितृ कार्य पूर्णतः भिन्न हैं, क्योंकि दिशा, चिह्न, मंत्र, सब अलग होते हैं। निष्कर्षतः सव्य अवस्था में जनेऊ बाएं कंधे पर होता है जो देव कार्य के लिए है, और अपसव्य अवस्था में जनेऊ दाएं कंधे पर तथा बाएं हाथ के नीचे होता है जो पितृ कार्य के लिए है, और यह भेद देव तथा पितृ कार्यों के बीच का सूक्ष्म लेकिन अत्यंत महत्त्वपूर्ण शास्त्रीय अंतर है।
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