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विस्तृत उत्तर
देव कार्य में यज्ञोपवीत बाएँ कंधे पर रहता है, जिसे सव्य कहा जाता है। पितृ कार्य में यज्ञोपवीत दाएँ कंधे पर रखा जाता है, जिसे अपसव्य या प्राचीनावीत कहा जाता है। ऋषि तर्पण के समय जनेऊ को माला की तरह गले में रखा जाता है, जिसे निवीत कहा जाता है। इस प्रकार देव, पितृ और ऋषि कर्मों में जनेऊ की मुद्रा अलग-अलग होती है।
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