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पितृ कार्य से जुड़े सभी प्रश्न(10)

पितृ कार्य पर शास्त्रीय व्याख्या, विधि, नियम, मंत्र और लाभ — सब एक ही स्थान पर। कुल 10 प्रश्न उपलब्ध हैं।

लोक

पितृ कार्य में जनेऊ कैसे रखें?

पितृ कार्य में जनेऊ अपसव्य रखें।

#पितृ कार्य#जनेऊ#अपसव्य
ब्राह्मण भोजन

पितृ कार्य में कितने ब्राह्मण बुलाएं?

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार श्राद्ध में पितृ कार्य के लिए तीन या अयुग्म विषम संख्या जैसे एक, तीन, पाँच ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है। अयुग्म का अर्थ है विषम संख्या जो दो से विभाज्य न हो। ब्राह्मण भगवान के भक्त, ज्ञाननिष्ठ और योगी होने चाहिए।

#पितृ कार्य#तीन ब्राह्मण#अयुग्म विषम
ब्राह्मण भोजन

श्राद्ध में कितने ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए?

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार श्राद्ध में देव कार्य के लिए दो और पितृ कार्य के लिए तीन या अयुग्म विषम संख्या जैसे एक, तीन, पाँच ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है। ब्राह्मणों को आदरपूर्वक बैठाकर, पूर्वजों की उपस्थिति की भावना से भोजन कराकर, दक्षिणा और वस्त्र देकर आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

#ब्राह्मण भोजन#देव कार्य#पितृ कार्य
श्राद्ध विधि

अपसव्य का अर्थ क्या है?

अपसव्य वह अवस्था है जिसमें जनेऊ दाएं कंधे पर और बाएं हाथ के नीचे रखा जाता है। यह पितृ कार्य अर्थात् श्राद्ध, तर्पण और पिण्डदान के समय की विशेष अवस्था है। अप विपरीत और सव्य बाएं से बना यह शब्द है, अर्थात् सव्य का उलट या दाएं ओर। यह देव कार्य की सव्य अवस्था से भिन्न है।

#अपसव्य#जनेऊ अवस्था#पितृ कार्य
श्राद्ध विधि

श्राद्ध करते समय किस दिशा में मुख रखें?

श्राद्ध करते समय कर्ता का मुख अनिवार्य रूप से दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए। शास्त्रों में दक्षिण दिशा को यमलोक और पितृलोक की दिशा माना गया है। पितर भी दक्षिण दिशा से ही आते हैं। देव कार्य में पूर्व या उत्तर, और पितृ कार्य में दक्षिण दिशा होती है।

#दक्षिण दिशा#श्राद्ध दिशा#पितृ कार्य
लोक

देव कार्य और पितृ कार्य की जनेऊ मुद्रा में क्या अंतर है?

देव कार्य में सव्य, पितृ कार्य में अपसव्य और ऋषि तर्पण में निवीत मुद्रा रखी जाती है।

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लोक

पितृ कार्य में अपसव्य मुद्रा क्यों रखी जाती है?

पितृ कार्य में जनेऊ दाएँ कंधे पर रखी जाती है, जिसे अपसव्य मुद्रा कहा जाता है।

#अपसव्य#जनेऊ#पितृ कार्य
लोक

तैत्तिरीय उपनिषद् में पितृ कार्य के बारे में क्या कहा गया है?

तैत्तिरीय उपनिषद् कहता है—देव और पितृ कार्यों में कभी प्रमाद नहीं करना चाहिए।

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लोक

पितृ कार्य को देव कार्य जितना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है?

तैत्तिरीय उपनिषद् देव और पितृ कार्यों में प्रमाद न करने का आदेश देता है, इसलिए पितृ कार्य देव कार्य जितना आवश्यक है।

#पितृ कार्य#देव कार्य#तैत्तिरीय उपनिषद
दैनिक पूजा में धातु

चांदी का प्रयोग किस पूजा में श्रेष्ठ है?

चांदी का प्रयोग पितृ-कार्य (श्राद्ध आदि) में श्रेष्ठ माना गया है — शास्त्रों के अनुसार चांदी का संबंध पितरों से है इसलिए इसमें श्रेष्ठ फल देती है।

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