विस्तृत उत्तर
श्राद्ध करते समय दक्षिण दिशा में मुख रखना अनिवार्य है। स्पष्ट उत्तर के अनुसार श्राद्ध करते समय कर्ता का मुख दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए। शास्त्रीय आधार के अनुसार श्राद्ध कर्म के दौरान देव कार्य पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके किए जाते हैं, परंतु पितृ कार्य करते समय कर्ता का मुख अनिवार्य रूप से दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए, क्योंकि शास्त्रों में दक्षिण दिशा को यमलोक और पितृलोक की दिशा माना गया है।
दिशा का भेद देव कार्य और पितृ कार्य में स्पष्ट रूप से किया गया है। देव कार्य में मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखा जाता है। पितृ कार्य अर्थात् श्राद्ध में मुख अनिवार्य रूप से दक्षिण दिशा की ओर रखा जाता है। दक्षिण दिशा का महत्व कई कारणों से है। पहला कारण यह है कि शास्त्रों में दक्षिण दिशा यमलोक की दिशा मानी गई है। दूसरा कारण यह है कि शास्त्रों में दक्षिण दिशा पितृलोक की दिशा भी मानी गई है। तीसरा कारण यह है कि पितर भी दक्षिण दिशा से ही आते हैं, क्योंकि वायु पुराण के अनुसार पितर दक्षिण दिशा से ही चंद्रलोक के माध्यम से वायु रूप में आते हैं, इसलिए श्राद्ध भी इसी दिशा में करना चाहिए।
यहाँ अनिवार्य शब्द का विशेष महत्व है। शास्त्रों ने अनिवार्य रूप से शब्द प्रयोग किया है, अर्थात् यह कोई वैकल्पिक नियम नहीं है, बल्कि आवश्यक नियम है। दक्षिण दिशा के बिना श्राद्ध अधूरा रहता है। दिशा का सम्पूर्ण विधान देखें तो देव कार्य में दिशा पूर्व या उत्तर होती है और जनेऊ बाएं कंधे पर सव्य अवस्था में रहता है। पितृ कार्य अर्थात् श्राद्ध में दिशा दक्षिण होती है और जनेऊ दाएं कंधे पर अपसव्य अवस्था में रखा जाता है।
पितरों के आगमन का सम्पूर्ण मार्ग भी इसी दिशा से जुड़ा है। पितर चंद्रलोक से आते हैं, दक्षिण दिशा से आते हैं, वायु रूप में आते हैं, और गंतव्य उनका घर का द्वार होता है। व्यावहारिक मार्गदर्शन के अनुसार श्राद्ध स्थल पर बैठते समय मुख दक्षिण दिशा में रखना चाहिए, तर्पण, पिण्डदान सब दक्षिण की ओर करना चाहिए, और कुशा भी दक्षिण की ओर बिछानी चाहिए। शास्त्रीय स्रोत के अनुसार आश्वलायन गृह्यसूत्र, गरुड़ पुराण और याज्ञवल्क्य स्मृति में श्राद्ध की सूक्ष्म विधि का विस्तार से वर्णन है। यह नियम सिद्ध करता है कि दिशा का श्राद्ध में अत्यंत सूक्ष्म महत्व है, क्योंकि गलत दिशा का अर्थ गलत संपर्क है। निष्कर्षतः श्राद्ध करते समय कर्ता का मुख अनिवार्य रूप से दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए, क्योंकि शास्त्रों में दक्षिण दिशा को यमलोक और पितृलोक की दिशा माना गया है, और पितर भी दक्षिण दिशा से ही आते हैं।
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