विस्तृत उत्तर
पितृ कार्य को देव कार्य जितना महत्वपूर्ण इसलिए माना गया है क्योंकि वैदिक और स्मार्त परम्पराओं में पितृ उपासना मानव जीवन का अपरिहार्य कर्तव्य है। तैत्तिरीय उपनिषद् की शिक्षावली का स्पष्ट निर्देश है—'देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्', अर्थात देव और पितृ कार्यों में किसी भी परिस्थिति में प्रमाद या आलस्य नहीं करना चाहिए। यह वाक्य सिद्ध करता है कि देव उपासना के समतुल्य ही पितृ उपासना भी आवश्यक है। श्राद्ध, तर्पण और पिण्डदान के माध्यम से पितरों की तृप्ति होती है और वे आयु, संतति, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष और सुख जैसे आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक