📖
विस्तृत उत्तर
पितृ कार्य में यज्ञोपवीत को दाएँ कंधे पर रखा जाता है, जिसे अपसव्य या प्राचीनावीत कहा जाता है। देव-पूजन में जनेऊ बाएँ कंधे पर रहता है और उसे सव्य कहा जाता है। पितृ-तर्पण देव-कर्म से भिन्न दिशा और ऊर्जा वाला कर्म है, इसलिए इसमें अपसव्य मुद्रा अपनाई जाती है। यह मुद्रा पितृलोक से संबंध स्थापित करने वाली शास्त्रोक्त व्यवस्था है।
🔗
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक
इसे अपने प्रियजनों के साथ साझा करें
क्या यह उत्तर सहायक था?
