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ब्राह्मण भोजन⏱ 3 मिनट पठन

पितृ कार्य में कितने ब्राह्मण बुलाएं?

पितृ कार्य अर्थात् श्राद्ध में ब्राह्मणों की संख्या शास्त्रों में स्पष्ट निर्धारित है।

संक्षिप्त उत्तर

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार श्राद्ध में पितृ कार्य के लिए तीन या अयुग्म विषम संख्या जैसे एक, तीन, पाँच ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है। अयुग्म का अर्थ है विषम संख्या जो दो से विभाज्य न हो। ब्राह्मण भगवान के भक्त, ज्ञाननिष्ठ और योगी होने चाहिए।

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विस्तृत उत्तर

पितृ कार्य अर्थात् श्राद्ध में ब्राह्मणों की संख्या शास्त्रों में स्पष्ट निर्धारित है। शास्त्रीय आधार के अनुसार श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार श्राद्ध में देव कार्य के लिए दो और पितृ कार्य के लिए तीन या अयुग्म अर्थात् विषम संख्या जैसे एक, तीन, पांच ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है।

पितृ कार्य के लिए ब्राह्मणों की संख्या तीन या विषम होनी चाहिए। मुख्य संख्या तीन है, परंतु अयुग्म अर्थात् विषम संख्या जैसे एक, तीन, पांच भी मान्य है। अयुग्म का अर्थ है ऐसी संख्या जो दो से विभाज्य न हो, अर्थात् विषम संख्या। इसलिए पितृ कार्य में ब्राह्मणों की संख्या एक, तीन, पाँच, सात आदि हो सकती है।

पितृ कार्य और देव कार्य में संख्या का यह भेद विशेष महत्व रखता है। देव कार्य के लिए दो ब्राह्मण अर्थात् युग्म सम संख्या निर्धारित है। पितृ कार्य के लिए विषम संख्या निर्धारित है। यह भेद इसलिए है क्योंकि देव कार्य और पितृ कार्य की प्रकृति अलग होती है, और दोनों के लिए शास्त्रों में अलग विधान निर्धारित किया गया है।

ब्राह्मणों के चयन में सावधानी रखनी चाहिए। श्राद्ध में हव्य-कव्य का दान भगवान के भक्तों, ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मणों या योगियों को ही देना चाहिए। अर्थात् साधारण व्यक्तियों को नहीं, बल्कि सद्गुणी, धार्मिक, और ज्ञानी ब्राह्मणों को ही आमंत्रित करना चाहिए।

ब्राह्मणों को बैठाने और भोजन कराने की विधि भी विशेष है। पंचबलि के पश्चात् आमंत्रित ब्राह्मणों को अत्यंत आदरपूर्वक आसन पर बैठाकर भोजन कराया जाता है। यह क्रम महत्वपूर्ण है, क्योंकि पहले पंचबलि और फिर ब्राह्मण भोजन होता है।

ब्राह्मणों को भोजन कराते समय एक विशेष भावना रखनी चाहिए। भोजन कराते समय ब्राह्मणों के शरीर में अपने पूर्वजों की उपस्थिति की भावना करनी चाहिए। अर्थात् कर्ता को यह भावना रखनी चाहिए कि वह जो ब्राह्मणों को भोजन करा रहा है, वह वास्तव में अपने पूर्वजों को ही भोजन करा रहा है।

भोजन के पश्चात् दक्षिणा और वस्त्र देने की विधि भी है। भोजन के पश्चात् उन्हें ससम्मान दक्षिणा और वस्त्र भेंट कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। दक्षिणा और वस्त्र देना अनिवार्य है, क्योंकि बिना दक्षिणा के कोई भी पूजा या अनुष्ठान पूर्ण नहीं माना जाता।

ब्राह्मणों के व्यवहार में सावधानी आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति क्रोध करता है, मार्ग गमन करता है, या अनुचित आचरण करता है, तो पितर निराश होकर लौट जाते हैं। इसलिए श्राद्ध के लिए सद्गुणी और सच्चरित्र ब्राह्मणों का चयन ही करना चाहिए। शास्त्रीय आधार के रूप में श्रीमद्भागवत पुराण, याज्ञवल्क्य स्मृति और आश्वलायन गृह्यसूत्र इस विधान के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः पितृ कार्य अर्थात् श्राद्ध में तीन या अयुग्म विषम संख्या जैसे एक, तीन, पाँच ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है। ये ब्राह्मण भगवान के भक्त, ज्ञाननिष्ठ और योगी होने चाहिए।

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