विस्तृत उत्तर
देव कार्य के लिए दो ब्राह्मणों को भोजन कराना शास्त्रों में निर्धारित है। शास्त्रीय आधार के अनुसार श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार श्राद्ध में देव कार्य के लिए दो और पितृ कार्य के लिए तीन या अयुग्म अर्थात् विषम संख्या जैसे एक, तीन, पांच ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है।
देव कार्य का अर्थ देखें तो देव कार्य वह अनुष्ठान है जो देवताओं के लिए किया जाता है, अर्थात् देवताओं की प्रसन्नता के लिए अनुष्ठान। श्राद्ध में देव कार्य का भी एक भाग होता है, क्योंकि श्राद्ध केवल पितृ कार्य नहीं है, बल्कि इसमें देव कार्य भी शामिल है। देव कार्य के लिए दो ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है।
देव कार्य और पितृ कार्य की संख्या में अंतर है। देव कार्य के लिए दो ब्राह्मण होते हैं, जो युग्म अर्थात् सम संख्या है। पितृ कार्य के लिए तीन या अयुग्म विषम संख्या जैसे एक, तीन, पाँच ब्राह्मण होते हैं। यह भेद इसलिए है क्योंकि देव कार्य और पितृ कार्य की प्रकृति अलग होती है, और दोनों के लिए शास्त्रों में अलग विधान निर्धारित किया गया है।
ब्राह्मणों के चयन में भी विशेष सावधानी रखनी चाहिए। श्राद्ध में हव्य-कव्य का दान भगवान के भक्तों, ज्ञाननिष्ठ ब्राह्मणों या योगियों को ही देना चाहिए। अर्थात् देव कार्य के लिए भी ज्ञानी, धार्मिक और सद्गुणी ब्राह्मणों को ही आमंत्रित करना चाहिए।
ब्राह्मणों को बैठाने और भोजन कराने की विधि देव कार्य और पितृ कार्य दोनों में समान होती है। पंचबलि के पश्चात् आमंत्रित ब्राह्मणों को अत्यंत आदरपूर्वक आसन पर बैठाकर भोजन कराया जाता है। भोजन कराते समय ब्राह्मणों में देवताओं की उपस्थिति की भावना रखनी चाहिए, और भोजन के पश्चात् उन्हें दक्षिणा और वस्त्र देकर आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।
देव कार्य और पितृ कार्य की दिशा भी अलग होती है। श्राद्ध कर्म के दौरान देव कार्य पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके किए जाते हैं, परंतु पितृ कार्य करते समय कर्ता का मुख अनिवार्य रूप से दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए। इसी प्रकार जनेऊ की स्थिति भी अलग होती है, अर्थात् देव कार्य में जनेऊ बाएं कंधे पर सव्य अवस्था में रहता है, और पितृ कार्य में दाएं कंधे पर अपसव्य अवस्था में होता है।
देव कार्य का यह विधान सिद्ध करता है कि सनातन धर्म में देव और पितृ कार्यों के बीच स्पष्ट भेद है, और दोनों के लिए शास्त्रों में अलग नियम निर्धारित हैं। शास्त्रीय आधार के रूप में श्रीमद्भागवत पुराण और अन्य ग्रंथ इस विधान के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः देव कार्य के लिए दो ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान है, जो श्रीमद्भागवत पुराण में स्पष्ट रूप से वर्णित है। ये ब्राह्मण भगवान के भक्त, ज्ञाननिष्ठ और योगी होने चाहिए, और उन्हें आदरपूर्वक भोजन कराकर दक्षिणा और वस्त्र देकर आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।
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