विस्तृत उत्तर
भोजन के बाद ब्राह्मणों को दक्षिणा और वस्त्र देना अनिवार्य है। शास्त्रीय आधार के अनुसार भोजन के पश्चात् उन्हें ससम्मान दक्षिणा और वस्त्र भेंट कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।
ब्राह्मणों को भोजन के बाद दो मुख्य चीज़ें देनी चाहिए। पहली चीज़ है दक्षिणा, अर्थात् धन का अर्पण। दूसरी चीज़ है वस्त्र, अर्थात् नए कपड़े। ये दोनों ससम्मान अर्थात् पूर्ण आदर के साथ देनी चाहिए। दक्षिणा और वस्त्र देने का उद्देश्य ब्राह्मणों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना है।
दक्षिणा का विशेष महत्व है। शास्त्रों में बिना दक्षिणा के कोई भी पूजा या अनुष्ठान पूर्ण नहीं माना जाता। दक्षिणा का अर्थ है धन का अर्पण, जो कर्ता ब्राह्मणों को अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार देता है। यह कर्ता की पवित्र भावना का प्रतीक है, और श्राद्ध की पूर्णता का अंग है।
वस्त्र देने का भी विशेष महत्व है। नए वस्त्र देना ब्राह्मणों के प्रति आदर का प्रतीक है। ब्राह्मण ही पूर्वजों के प्रतिनिधि होते हैं, और उन्हें वस्त्र देना वास्तव में पूर्वजों को ही वस्त्र देने के समान है। यह श्राद्ध की भावना और सम्मान को दर्शाता है।
दक्षिणा और वस्त्र देने की विधि भी विशेष है। इन्हें ससम्मान देना चाहिए, अर्थात् पूर्ण आदर और श्रद्धा के साथ। केवल देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि देते समय कर्ता का भाव भी पवित्र होना चाहिए। कर्ता को यह भावना रखनी चाहिए कि वह ब्राह्मणों के माध्यम से अपने पूर्वजों को ही ये भेंट दे रहा है।
इनके बाद आशीर्वाद प्राप्त करना अंतिम कार्य है। दक्षिणा और वस्त्र देने के बाद ब्राह्मणों से आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। यह आशीर्वाद वास्तव में पूर्वजों का ही होता है, जो ब्राह्मणों के माध्यम से कर्ता को मिलता है। पितरों के आशीर्वाद से कर्ता को आयु, धन, संतान, विद्या आदि सब फल प्राप्त होते हैं।
ब्राह्मण भोजन के सम्पूर्ण क्रम को देखें तो पहले पंचबलि की जाती है, फिर आमंत्रित ब्राह्मणों को आसन पर बैठाया जाता है, फिर उनमें पूर्वजों की उपस्थिति की भावना रखी जाती है, फिर भोजन कराया जाता है, फिर दक्षिणा और वस्त्र दिए जाते हैं, और अंत में आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। यह श्राद्ध का अंतिम और महत्वपूर्ण भाग है।
याज्ञवल्क्य स्मृति और अन्य शास्त्रों में श्राद्ध की यह विधि स्पष्ट रूप से वर्णित है। श्राद्धकर्ता को पवित्र आचरण वाला होना चाहिए, ताकि उसका दान, दक्षिणा और वस्त्र भेंट सब सच्ची श्रद्धा से हो। शास्त्रीय आधार के रूप में श्रीमद्भागवत पुराण, याज्ञवल्क्य स्मृति, आश्वलायन गृह्यसूत्र और गरुड़ पुराण इस विधान के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः भोजन के बाद ब्राह्मणों को ससम्मान दक्षिणा और वस्त्र भेंट करना चाहिए, और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। यह श्राद्ध की पूर्णता का अंग है, क्योंकि बिना दक्षिणा और वस्त्र के अनुष्ठान अधूरा रह जाता है।
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