लक्ष्मणजी ने परशुरामजी के फरसे (परशु) के बारे में क्या कहा?
का सरल उत्तर
सरल उत्तर
लक्ष्मणजी ने निर्भीकता से कहा — 'बहु धनुही तोरी लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं' — बचपन में बहुत धनुष तोड़े, कभी ऐसा क्रोध नहीं हुआ। फरसे से नहीं डरे — हम क्षत्रिय हैं, युद्ध से भय नहीं।
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श्रेणी
रामचरितमानस — बालकाण्ड
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