विस्तृत उत्तर
लक्ष्मणजी ने परशुरामजी के फरसे (परशु) के बारे में बड़ी निर्भीकता से कहा — हमने तो बचपन में बहुत-सी धनुहियाँ (छोटे धनुष) तोड़ी हैं, कभी ऐसा क्रोध किसी ने नहीं किया।
चौपाई — 'बहु धनुही तोरी लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥'
अर्थ — हमने बचपनमें बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ी हैं; हे गोसाईं! कभी किसीने ऐसा क्रोध नहीं किया।
लक्ष्मणजी ने परशुरामजी के फरसे (कुल्हाड़ी) को देखकर भी निर्भय रहकर कहा कि हम क्षत्रिय हैं, युद्ध से नहीं डरते। यह वाद-विवाद बहुत तीखा हुआ — लक्ष्मणजी ने व्यंग्य से कहा कि एक पुराना धनुष टूट गया तो इतना क्रोध? परशुरामजी और क्रोधित हुए पर विश्वामित्रजी ने बीच-बचाव किया।





