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सरल उत्तर

सांख्य दर्शन में प्रकृति और पुरुष

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सांख्य में प्रकृति जड़ है (तीन गुणों की साम्यावस्था) और पुरुष चेतन। प्रकृति के विकार से सृष्टि बनती है। जब पुरुष प्रकृति के विकारों में स्वयं को मान लेता है — बन्धन होता है। तत्वज्ञान से 'मैं पुरुष हूँ, प्रकृति नहीं' — यह बोध मोक्ष देता है।

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