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सांख्य दर्शन में प्रकृति और पुरुष?

सांख्य में प्रकृति जड़ है (तीन गुणों की साम्यावस्था) और पुरुष चेतन। प्रकृति के विकार से सृष्टि बनती है।

संक्षिप्त उत्तर

सांख्य में प्रकृति जड़ है (तीन गुणों की साम्यावस्था) और पुरुष चेतन। प्रकृति के विकार से सृष्टि बनती है। जब पुरुष प्रकृति के विकारों में स्वयं को मान लेता है — बन्धन होता है। तत्वज्ञान से 'मैं पुरुष हूँ, प्रकृति नहीं' — यह बोध मोक्ष देता है।

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विस्तृत उत्तर

सांख्य दर्शन महर्षि कपिल द्वारा प्रतिपादित और भारतीय दर्शन के षड्दर्शनों में सबसे प्राचीन माने जाने वाले दर्शनों में से एक है। इसका प्रमुख ग्रन्थ ईश्वरकृष्ण रचित 'सांख्यकारिका' है। सांख्य दर्शन में समस्त सृष्टि को केवल दो मूल तत्वों में विभक्त किया गया है — प्रकृति और पुरुष।

प्रकृति जड़ है, सत्, रज और तम — तीन गुणों की साम्यावस्था का नाम है। जब ये तीनों गुण समान मात्रा में होते हैं तो प्रकृति अव्यक्त रहती है। जैसे ही इनमें असंतुलन होता है, सृष्टि का क्रम प्रारम्भ होता है — महत्, अहंकार, पाँच तन्मात्राएँ, ग्यारह इन्द्रियाँ और पाँच महाभूत — ये सब प्रकृति के विकार हैं। प्रकृति अनादि है और स्वयं किसी कारण से उत्पन्न नहीं हुई।

पुरुष चेतन तत्व है — निष्क्रिय, अपरिणामी और साक्षी। पुरुष प्रकृति का भोक्ता है, स्वयं कर्ता नहीं। जब पुरुष प्रकृति के विकारों में अपने आप को मान लेता है तो बन्धन होता है। तत्वज्ञान से — यह जानने पर कि 'मैं प्रकृति नहीं, शुद्ध चेतन पुरुष हूँ' — मोक्ष प्राप्त होता है। सांख्य निरीश्वरवादी है — वह किसी ईश्वर को नहीं मानता, इसलिए यह षड्दर्शनों में विशिष्ट स्थान रखता है। इसका व्यावहारिक पक्ष योगदर्शन है।

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