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वेदों में प्रकृति का महत्व क्या है?

वेदों में प्रकृति देव-स्वरूप है। अथर्ववेद (12/1) का पृथ्वी सूक्त — 'माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः' — पृथ्वी को माता मानता है।

संक्षिप्त उत्तर

वेदों में प्रकृति देव-स्वरूप है। अथर्ववेद (12/1) का पृथ्वी सूक्त — 'माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः' — पृथ्वी को माता मानता है। ऋग्वेद में जल, वायु, सूर्य की स्तुति है। 'ऋत' की रक्षा वैदिक पर्यावरण-दर्शन का मूल है।

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विस्तृत उत्तर

## वेदों में प्रकृति का महत्व

वैदिक दृष्टि में प्रकृति: वेद प्रकृति को केवल संसाधन नहीं — देवीय शक्ति और जीवंत सत्ता मानते हैं। प्रत्येक तत्त्व — पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश — देव-स्वरूप है।

पृथ्वी सूक्त (अथर्ववेद 12/1): 63 मंत्रों में भूमि-देवी की वंदना: 'माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।' — पृथ्वी मेरी माता है, मैं उसका पुत्र हूँ। यह मानव की पृथ्वी के प्रति जिम्मेदारी की उद्घोषणा है।

जल-स्तुति (ऋग्वेद 10/9 — आपः सूक्त): 'आपो हि ष्ठा मयोभुवः।' — हे जल! तुम सुख देने वाले हो। जल पवित्र देव — पापनाशक और जीवनदायी।

वायु देव: ऋग्वेद (1/134) में वायु को देव, प्राण का आधार और ब्रह्म का श्वास कहा गया है।

ऋत — प्रकृति की व्यवस्था: सूर्योदय-सूर्यास्त, ऋतु-परिवर्तन, नदियों का प्रवाह — सब 'ऋत' के अनुसार। इस व्यवस्था की रक्षा करना मनुष्य का कर्तव्य है।

वैदिक पर्यावरण-चेतना (यजुर्वेद 36/17): 'द्यौः शान्तिः अन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिः।' — आकाश, अंतरिक्ष और पृथ्वी पर शांति हो। अग्नि, वायु और जल को दूषित न करने के निर्देश अथर्ववेद में हैं।

उत्तर को थोड़ा और स्पष्ट करें

वेदों में प्रकृति का महत्व क्या है को संदर्भ सहित समझें

वेदों में प्रकृति का महत्व क्या है का सबसे सीधा सार यह है: वेदों में प्रकृति देव-स्वरूप है। अथर्ववेद (12/1) का पृथ्वी सूक्त — 'माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः' — पृथ्वी को माता मानता है। ऋग्वेद में जल, वायु, सूर्य की स्तुति...

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