विस्तृत उत्तर
## वेदों में प्रकृति का महत्व
वैदिक दृष्टि में प्रकृति: वेद प्रकृति को केवल संसाधन नहीं — देवीय शक्ति और जीवंत सत्ता मानते हैं। प्रत्येक तत्त्व — पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश — देव-स्वरूप है।
पृथ्वी सूक्त (अथर्ववेद 12/1): 63 मंत्रों में भूमि-देवी की वंदना: 'माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।' — पृथ्वी मेरी माता है, मैं उसका पुत्र हूँ। यह मानव की पृथ्वी के प्रति जिम्मेदारी की उद्घोषणा है।
जल-स्तुति (ऋग्वेद 10/9 — आपः सूक्त): 'आपो हि ष्ठा मयोभुवः।' — हे जल! तुम सुख देने वाले हो। जल पवित्र देव — पापनाशक और जीवनदायी।
वायु देव: ऋग्वेद (1/134) में वायु को देव, प्राण का आधार और ब्रह्म का श्वास कहा गया है।
ऋत — प्रकृति की व्यवस्था: सूर्योदय-सूर्यास्त, ऋतु-परिवर्तन, नदियों का प्रवाह — सब 'ऋत' के अनुसार। इस व्यवस्था की रक्षा करना मनुष्य का कर्तव्य है।
वैदिक पर्यावरण-चेतना (यजुर्वेद 36/17): 'द्यौः शान्तिः अन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिः।' — आकाश, अंतरिक्ष और पृथ्वी पर शांति हो। अग्नि, वायु और जल को दूषित न करने के निर्देश अथर्ववेद में हैं।





