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वेद ज्ञान📜 ऋग्वेद 1/22/18, 4/23/8 (ऋत), अथर्ववेद 12/1/1, मनुस्मृति 2/6, वैदिक दर्शन1 मिनट पठन

वेदों में धर्म का अर्थ क्या है?

संक्षिप्त उत्तर

वेदों में धर्म का मूल रूप 'ऋत' है — ब्रह्मांडीय सत्य-व्यवस्था जिसे वरुण देव संरक्षित करते हैं। 'धारयति इति धर्मः' — जो धारण करे, वह धर्म। मनुस्मृति (2/6) — 'वेदोऽखिलो धर्ममूलम्' — सम्पूर्ण वेद ही धर्म का मूल है।

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विस्तृत उत्तर

## वेदों में धर्म का अर्थ

'धर्म' का व्युत्पत्ति-अर्थ: 'धृ' धातु (धारण करना) से — 'धारयति इति धर्मः' — जो धारण करे, वह धर्म। यह वह व्यवस्था है जो व्यक्ति, समाज और ब्रह्मांड को टिकाए रखती है।

वेदों में 'ऋत' — धर्म का आदि रूप: वेदों में धर्म का प्राचीनतम रूप 'ऋत' है — ब्रह्मांडीय सत्य-व्यवस्था। ऋग्वेद (4/23/8) में ऋत का रक्षक वरुण देव है। 'ऋत' से 'सत्य' और सत्य से 'धर्म' प्रकट होता है।

वेदों में धर्म के रूप

  • सार्वभौमिक धर्म: सूर्योदय, नदियों का प्रवाह, ऋतु-क्रम — सब ऋत है। इसका पालन करना धर्म, उल्लंघन अधर्म।
  • यज्ञिक धर्म: यज्ञ करना, देवताओं को हविष्य देना, प्रकृति का सम्मान।
  • नैतिक धर्म: ऋग्वेद (1/22/18) में — सत्यवादिता, अहिंसा, दान, अतिथि-सत्कार।
  • वर्णधर्म: पुरुषसूक्त में चार वर्णों के स्वधर्म का उल्लेख।

मनुस्मृति का वैदिक सूत्र (2/6): 'वेदोऽखिलो धर्ममूलम्' — सम्पूर्ण वेद ही धर्म का मूल है।

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शास्त्रीय स्रोत
ऋग्वेद 1/22/18, 4/23/8 (ऋत), अथर्ववेद 12/1/1, मनुस्मृति 2/6, वैदिक दर्शन
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