विस्तृत उत्तर
## वेदों में धर्म का अर्थ
'धर्म' का व्युत्पत्ति-अर्थ: 'धृ' धातु (धारण करना) से — 'धारयति इति धर्मः' — जो धारण करे, वह धर्म। यह वह व्यवस्था है जो व्यक्ति, समाज और ब्रह्मांड को टिकाए रखती है।
वेदों में 'ऋत' — धर्म का आदि रूप: वेदों में धर्म का प्राचीनतम रूप 'ऋत' है — ब्रह्मांडीय सत्य-व्यवस्था। ऋग्वेद (4/23/8) में ऋत का रक्षक वरुण देव है। 'ऋत' से 'सत्य' और सत्य से 'धर्म' प्रकट होता है।
वेदों में धर्म के रूप
- ▸सार्वभौमिक धर्म: सूर्योदय, नदियों का प्रवाह, ऋतु-क्रम — सब ऋत है। इसका पालन करना धर्म, उल्लंघन अधर्म।
- ▸यज्ञिक धर्म: यज्ञ करना, देवताओं को हविष्य देना, प्रकृति का सम्मान।
- ▸नैतिक धर्म: ऋग्वेद (1/22/18) में — सत्यवादिता, अहिंसा, दान, अतिथि-सत्कार।
- ▸वर्णधर्म: पुरुषसूक्त में चार वर्णों के स्वधर्म का उल्लेख।
मनुस्मृति का वैदिक सूत्र (2/6): 'वेदोऽखिलो धर्ममूलम्' — सम्पूर्ण वेद ही धर्म का मूल है।





