विस्तृत उत्तर
वैशेषिक दर्शन के प्रणेता महर्षि कणाद हैं — कण-कण को खाते-परखते रहने की प्रवृत्ति के कारण उनका नाम 'कणाद' पड़ा। उनका 'वैशेषिक सूत्र' इस दर्शन का मूल ग्रन्थ है। 'विशेष' नामक पदार्थ पर विशेष बल देने के कारण इसे वैशेषिक कहते हैं।
वैशेषिक का परमाणु सिद्धान्त आधुनिक विज्ञान से सैकड़ों वर्ष पूर्व प्रतिपादित हो गया था। इस दर्शन के अनुसार सृष्टि के समस्त द्रव्यों का निर्माण चार प्रकार के परमाणुओं से हुआ है — पृथ्वी, जल, तेज (अग्नि) और वायु के परमाणु। ये परमाणु (अणु) अविभाज्य, नित्य और अत्यन्त सूक्ष्म हैं — इन्हें और विभाजित नहीं किया जा सकता। दो परमाणु मिलकर 'द्व्यणुक' बनाते हैं और तीन द्व्यणुक मिलकर 'त्र्यणुक' — इसी क्रम से स्थूल द्रव्य बनते हैं। ईश्वर इन परमाणुओं का संचालन करता है और सृष्टि का निमित्त कारण है, उपादान कारण नहीं।
वैशेषिक में सम्पूर्ण सत्ता को सात पदार्थों में बाँटा गया है — द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव। इनके सम्यक् विवेचन से जीव मोक्ष प्राप्त करता है। जॉन डाल्टन के परमाणु-सिद्धान्त से बहुत पहले कणाद ने यह दार्शनिक स्तर पर विकसित कर लिया था — यही इस दर्शन की विश्वप्रसिद्ध विशेषता है।





