का सरल उत्तर
सत्संग की तुलना पारस पत्थर से की गई है। जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है, वैसे ही दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं। सज्जन कुसंगति में भी साँप की मणि समान अपने गुण नहीं छोड़ते।
मूल प्रश्न का सम्पूर्ण शास्त्रीय उत्तर एक स्थान पर।
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