विस्तृत उत्तर
इस चौपाई में सत्संग की तुलना पारस पत्थर (पारसमणि) से की गई है।
पूरी चौपाई — 'सठ सुधरहिं सत्संगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई। बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥'
इसका अर्थ — दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारसके स्पर्शसे लोहा सुहावना हो जाता है (सुन्दर सोना बन जाता है)। किन्तु दैवयोगसे यदि कभी सज्जन कुसंगतिमें पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी साँपकी मणिके समान अपने गुणोंका ही अनुसरण करते हैं (जिस प्रकार साँपका संसर्ग पाकर भी मणि उसके विषको ग्रहण नहीं करती, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टोंके संगमें रहकर भी दूसरोंको प्रकाश ही देते हैं)।
सार — सत्संग पारस है जो लोहे (दुष्ट) को भी सोना (सज्जन) बना देता है, पर सज्जन साँप की मणि के समान हैं जो कुसंगति में भी अपने गुण नहीं छोड़ते।