धृतराष्ट्र उवाच | धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः | मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय
अर्थ: धृतराष्ट्र बोले - हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुए मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने भी क्या किया?
अर्जुन विषाद योग · Arjuna Vishada Yoga
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः | प्रवृत्ते शस्त्रसंपाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः
हे महीपते! धृतराष्ट्र! अब शस्त्रों के चलने की तैयारी हो ही रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्य को धारण करनेवाले राजाओं और उनके साथियों को व्यवस्थितरूप से सामने खड़े हुए देखकर कपिध्वज पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना गाण्डीव धनुष उठा लिया और अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण से ये वचन बोले।
हे महीपते! धृतराष्ट्र! अब शस्त्रों के चलने की तैयारी हो ही रही थी कि उस समय अन्यायपूर्वक राज्य को धारण करनेवाले राजाओं और उनके साथियों को व्यवस्थितरूप से सामने खड़े हुए देखकर कपिध्वज पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना गाण्डीव धनुष उठा लिया और अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण से ये वचन बोले।
Then, seeing the people of Dhritarashtra’s party standing arrayed and the discharge of weapons about to begin, Arjuna, the son of Pandu, whose ensign was a monkey, took up his bow and said the following to Krishna, O Lord of the earth.
Then, seeing the people of Dhritarashtra’s party standing arrayed and the discharge of weapons about to begin, Arjuna, the son of Pandu, whose ensign was a monkey, took up his bow and said the following to Krishna, O Lord of the earth.
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