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श्रीमद्भगवद्गीता · क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

श्लोक 33

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग · Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga

मूल पाठ

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते | सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जैसे सब जगह व्याप्त आकाश अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे कहीं भी लिप्त नहीं होता, ऐसे ही सब जगह परिपूर्ण आत्मा किसी भी देहमें लिप्त नहीं होता।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जैसे सब जगह व्याप्त आकाश अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे कहीं भी लिप्त नहीं होता, ऐसे ही सब जगह परिपूर्ण आत्मा किसी भी देहमें लिप्त नहीं होता।

English Meaning

As the all-pervading ether is not tainted, because of its subtlety, so the Self seated everywhere in the body is not tainted.

As the all-pervading ether is not tainted, because of its subtlety, so the Self seated everywhere in the body is not tainted.

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