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श्रीमद्भगवद्गीता · क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

श्लोक 35

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग · Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga

मूल पाठ

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा | भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

इस प्रकार जो ज्ञानरूपी नेत्रसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके अन्तर-(विभाग-) को तथा कार्य-कारणसहित प्रकृतिसे स्वयंको अलग जानते हैं, वे परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

इस प्रकार जो ज्ञानरूपी नेत्रसे क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके अन्तर-(विभाग-) को तथा कार्य-कारणसहित प्रकृतिसे स्वयंको अलग जानते हैं, वे परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं।

English Meaning

They who, by the eye of knowledge, perceive the distinction between the field and its knower and also the liberation from the Nature of being, go to the Supreme.

They who, by the eye of knowledge, perceive the distinction between the field and its knower and also the liberation from the Nature of being, go to the Supreme.

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