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श्रीमद्भगवद्गीता · सांख्य योग

श्लोक 58

सांख्य योग · Sankhya Yoga

मूल पाठ

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः | इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जिस तरह कछुआ अपने अङ्गोंको सब ओरसे समेट लेता है, ऐसे ही जिस कालमें यह कर्मयोगी इन्द्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे समेट लेता (हटा लेता) है, तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जिस तरह कछुआ अपने अङ्गोंको सब ओरसे समेट लेता है, ऐसे ही जिस कालमें यह कर्मयोगी इन्द्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे समेट लेता (हटा लेता) है, तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है।

English Meaning

When, like the tortoise which withdraws on all sides its limbs, he withdraws his senses from the sense-objects, then his wisdom becomes steady.

When, like the tortoise which withdraws on all sides its limbs, he withdraws his senses from the sense-objects, then his wisdom becomes steady.

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