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श्रीमद्भगवद्गीता · सांख्य योग

श्लोक 59

सांख्य योग · Sankhya Yoga

मूल पाठ

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः | रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

निराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

निराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है।

English Meaning

The objects of the senses turn away from the abstinent man leaving the longing (behind); but his longing also turns away on seeing the Supreme.

The objects of the senses turn away from the abstinent man leaving the longing (behind); but his longing also turns away on seeing the Supreme.

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