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श्रीमद्भगवद्गीता · सांख्य योग

श्लोक 60

सांख्य योग · Sankhya Yoga

मूल पाठ

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः | इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

हे कुन्तीनन्दन! (रसबुद्धि रहनेसे) यत्न करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

हे कुन्तीनन्दन! (रसबुद्धि रहनेसे) यत्न करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं।

English Meaning

The turbulent senses, O Arjuna, do violently carry away the mind of a wise man though he be striving (to control them).

The turbulent senses, O Arjuna, do violently carry away the mind of a wise man though he be striving (to control them).

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