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श्रीमद्भगवद्गीता · सांख्य योग

श्लोक 66

सांख्य योग · Sankhya Yoga

मूल पाठ

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना | न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जिसके मन-इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होनेसे उसको शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है?

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जिसके मन-इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होनेसे उसको शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है?

English Meaning

There is no knowledge of the Self to the unsteady and to the unsteady no meditation is possible, and to the unmeditative there can be no peace, and to the man who has no peace, how can there be happiness?

There is no knowledge of the Self to the unsteady and to the unsteady no meditation is possible, and to the unmeditative there can be no peace, and to the man who has no peace, how can there be happiness?

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