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श्रीमद्भगवद्गीता · सांख्य योग

श्लोक 7

सांख्य योग · Sankhya Yoga

मूल पाठ

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः | यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

कायरतारूप दोषसे तिरस्कृत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो, वह मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ। आपके शरण हुए मुझे शिक्षा दीजिये।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

कायरतारूप दोषसे तिरस्कृत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो, वह मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ। आपके शरण हुए मुझे शिक्षा दीजिये।

English Meaning

My heart is overpowered by the taint of pity; my mind is confused as to duty. I ask Thee: Tell me decisively what is good for me. I am Thy disciple. Instruct me who has taken refuge in Thee.

My heart is overpowered by the taint of pity; my mind is confused as to duty. I ask Thee: Tell me decisively what is good for me. I am Thy disciple. Instruct me who has taken refuge in Thee.

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