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श्रीमद्भगवद्गीता · सांख्य योग

श्लोक 8

सांख्य योग · Sankhya Yoga

मूल पाठ

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् | अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धम् राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

पृथ्वीपर धन-धान्य-समृद्ध और शत्रुरहित राज्य तथा स्वर्गमें देवताओंका आधिपत्य मिल जाय तो भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा जो शोक है, वह दूर हो जाय - ऐसा मैं नहीं देखता हूँ।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

पृथ्वीपर धन-धान्य-समृद्ध और शत्रुरहित राज्य तथा स्वर्गमें देवताओंका आधिपत्य मिल जाय तो भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा जो शोक है, वह दूर हो जाय - ऐसा मैं नहीं देखता हूँ।

English Meaning

I do not see that it would remove this sorrow that burns up my senses, even if I should attain prosperous and unrivalled dominion on earth or lordship over the gods.

I do not see that it would remove this sorrow that burns up my senses, even if I should attain prosperous and unrivalled dominion on earth or lordship over the gods.

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