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श्रीमद्भगवद्गीता · कर्म योग

श्लोक 5

कर्म योग · Karma Yoga

मूल पाठ

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् | कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता; क्योंकि (प्रकृतिके) परवश हुए सब प्राणियोंसे प्रकृतिजन्य गुण कर्म कराते हैं।

व्
विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता; क्योंकि (प्रकृतिके) परवश हुए सब प्राणियोंसे प्रकृतिजन्य गुण कर्म कराते हैं।

English Meaning

Verily none can ever remain for even a moment without performing action; for everyone is made to act helplessly indeed by the qualities born of Nature.

Verily none can ever remain for even a moment without performing action; for everyone is made to act helplessly indeed by the qualities born of Nature.

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